25 साल बाद भी बिंदुखत्ता के सवाल का जवाब नहीं उत्तराखंड में राज कर रहे राजनीतिज्ञों के पास !
लालकुआं विधानसभा का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है राजस्व गांव, वादों की राजनीति पर भारी पड़ता जमीनी सच, अब चुनावी रण में जनता मांगेगी हिसाब!
‘चाय पर चर्चा’ में आज फिर उठा बिंदुखत्ता राजस्व गांव का सवाल, सरकार और जनप्रतिनिधियों से ग्रामीणों ने पूछा, आखिर कब तक सिर्फ आश्वासन और वादों के सहारे चलेगा यह बहुचर्चित प्रकरण?
लालकुआं।
उत्तराखंड राज्य को बने 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन 25 वर्षों में प्रदेश ने कई सरकारें देखीं, सत्ता परिवर्तन देखा, राजनीतिक दलों के घोषणापत्र देखे और चुनाव दर चुनाव नेताओं के वादे भी सुने। लेकिन लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में एक सवाल आज भी वहीं खड़ा है, जहां वर्षों पहले था, बिंदुखत्ता को आखिर राजस्व गांव का दर्जा कब मिलेगा?
यह सवाल अब महज किसी एक गांव या क्षेत्र की प्रशासनिक मांग नहीं रह गया है। यह लालकुआं विधानसभा क्षेत्र का सबसे बड़ा और सबसे चर्चित चुनावी मुद्दा बन चुका है। यही वजह है कि रविवार को वनाधिकार संगठन बिंदुखत्ता के तत्वावधान में विकासपुरी (इंद्रानगर प्रथम) और तिवारीनगर (टूटी पुलिया) में आयोजित ‘चाय पर चर्चा’ कार्यक्रम में एक बार फिर बिंदुखत्ता के राजस्व गांव के मुद्दे ने जोर पकड़ा।
कार्यक्रम में जुटे ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि अब उन्हें आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए निर्णय, अधिसूचना और अपने अधिकारों की स्पष्ट कानूनी मान्यता।
25 साल में सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, लेकिन बिंदुखत्ता की तस्वीर क्यों नहीं बदली?
उत्तराखंड के गठन के बाद से प्रदेश में सत्ता के कई दौर आए। सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, विधायक बदले और राजनीतिक परिस्थितियां भी बदलीं। लेकिन बिंदुखत्ता की जनता के लिए राजस्व गांव का सवाल आज भी एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है।
हर चुनाव में यह मुद्दा फिर सामने आता है। राजनीतिक मंचों से बिंदुखत्ता की समस्या के समाधान की बातें होती हैं। जनता को उम्मीद दिखाई जाती है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही यह मुद्दा फिर सरकारी प्रक्रियाओं, फाइलों और आश्वासनों के बीच कहीं खो जाता है।
अब सवाल यह है कि आखिर 25 साल का इंतजार और कितना लंबा होगा?
वर्तमान सरकार और विधायक से भी जनता का सवाल
आज के ‘चाय पर चर्चा’ कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्थानीय विधायक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि बिंदुखत्ता के राजस्व गांव के मुद्दे की प्रभावी पैरवी नहीं की गई।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा विधायक और सरकार से बिंदुखत्ता की जनता को काफी उम्मीदें थी। चुनाव के दौरान किए गए वादों और सरकार की ओर से समय-समय पर दिए गए बयानों के बीच अब जनता परिणाम देखना चाहती है।
जनता पूछ रही है, अगर सरकार बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने के पक्ष में है तो फिर निर्णय क्यों नहीं? अगर कोई कानूनी या प्रशासनिक अड़चन है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? और यदि रास्ता साफ है तो अधिसूचना जारी करने में देरी किस बात की?
यही सवाल अब धीरे-धीरे लालकुआं विधानसभा की राजनीतिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है।
पूर्ववर्तियों की तरह वर्तमान सरकार भी वादे में विफल?
बिंदुखत्ता की जनता का एक बड़ा वर्ग अब यह मानने लगा है कि राजस्व गांव का मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए लंबे समय से वादा तो रहा, लेकिन प्राथमिकता कभी नहीं बन पाया।
पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी इस मुद्दे के समाधान के लिए कई प्रयास और दावे किए गए। प्रक्रियाएं चलीं, प्रस्ताव बने और उम्मीदें जगीं, लेकिन नतीजा आज भी शून्य दिखाई देता है।
अब यदि वर्तमान सरकार भी इस मुद्दे को अपने कार्यकाल में निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंचा पाती है, तो आगामी विधानसभा चुनाव में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा कि 25 साल से चले आ रहे इस मुद्दे के समाधान में आखिर किसकी जिम्मेदारी थी और किसने अपनी जिम्मेदारी निभाई?
2027 के चुनाव में जनता मांगेगी ‘राजस्व गांव’ का हिसाब?
आगामी विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं। राजनीतिक दल चुनावी तैयारियों में जुटेंगे, संभावित प्रत्याशी जनता के बीच पहुंचेंगे और विकास के नए वादे किए जाएंगे।
लेकिन लालकुआं विधानसभा में चुनावी तस्वीर अब पहले जैसी नहीं रहने वाली।
यहां प्रत्याशियों के सामने सड़क, बिजली, पानी और रोजगार जैसे तमाम मुद्दों के साथ एक सवाल पूरी मजबूती से खड़ा होगा—
“बिंदुखत्ता को राजस्व गांव कब?”
जो प्रत्याशी जनता के बीच जाएगा, उससे यह सवाल पूछा जाएगा। जो दल सत्ता में है, उससे उसके कार्यकाल का हिसाब मांगा जाएगा। जो विपक्ष में है, उससे पूछा जाएगा कि उसने इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से उठाया। और जो नया चेहरा चुनाव मैदान में उतरेगा, उससे भी जनता जानना चाहेगी कि उसके पास बिंदुखत्ता के लिए सिर्फ घोषणा है या कोई ठोस रोडमैप भी?
सत्ता के दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती
आगामी विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और उसके संभावित प्रत्याशियों के सामने बिंदुखत्ता का राजस्व गांव प्रकरण निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
क्योंकि यह मुद्दा अब केवल राजनीतिक भाषणों से शांत होने वाला नहीं है। सोशल मीडिया और जनजागरूकता के इस दौर में जनता सवाल पूछ रही है, दस्तावेज देख रही है और पुराने वादों को याद रख रही है।
जिस मुद्दे पर 25 साल से राजनीति होती रही हो, वह चुनाव आते-आते जनता की स्मृति से गायब नहीं होता। बल्कि हर चुनाव के साथ उसका राजनीतिक वजन बढ़ता जाता है।
आज की ‘चाय पर चर्चा’ ने फिर जगा दी चुनावी बहस
रविवार को आयोजित कार्यक्रम में वनाधिकार संगठन ने स्पष्ट किया कि जब तक वनाधिकार अधिनियम के तहत राजस्व गांव की अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक जनजागरण और जनसंपर्क अभियान जारी रहेगा।
ग्रामीणों का कहना है कि बिंदुखत्ता के सामुदायिक वनाधिकार दावे को जिला स्तरीय समिति द्वारा स्वीकृति देकर राज्य सरकार को भेजा जा चुका है। ऐसे में अब सरकार को आगे की कार्रवाई में अनावश्यक विलंब नहीं करना चाहिए।
यानी आज की ‘चाय पर चर्चा’ सिर्फ एक बैठक नहीं थी। यह आने वाले दिनों की राजनीतिक बहस का संकेत भी है।
बिंदुखत्ता के राजस्व गांव का मुद्दा अब सिर्फ एक सरकारी फाइल नहीं है। यह लालकुआं विधानसभा की जनता की उम्मीद, असंतोष और राजनीतिक चेतना तीनों का प्रतीक बन चुका है।
25 साल में अगर सरकारें बदलती रहीं और बिंदुखत्ता का सवाल वहीं खड़ा रहा, तो सवाल केवल बिंदुखत्ता की जनता का नहीं, बल्कि उन सभी सरकारों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का है, जिन्होंने इस मुद्दे को समाधान तक पहुंचाने का दावा किया।
अब आगामी विधानसभा चुनाव में लालकुआं की जनता के सामने भी एक बड़ा फैसला होगा और राजनीतिक दलों के सामने भी।
क्या जनता फिर वही पुराने वादे सुनेगी?
क्या फिर कोई नया आश्वासन मिलेगा?
क्या चुनाव से पहले राजस्व गांव की अधिसूचना जारी होगी?
या फिर एक बार फिर बिंदुखत्ता का मुद्दा चुनावी मंचों पर गूंजेगा और चुनाव के बाद फाइलों में खो जाएगा?
यह सवाल अब सिर्फ बिंदुखत्ता नहीं, पूरे लालकुआं विधानसभा क्षेत्र का सवाल है।
और शायद आगामी विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के लिए सबसे कठिन सवाल भी यही होगा—
“25 साल हो गए साहब… अब बिंदुखत्ता को राजस्व गांव कब बनाएंगे?”
—दर्पण न्यूज 24×7
