

एक साल शांति की शर्त पर रिहा कॉजपा नेता, दिल्ली में दूसरे दिन भी पुलिस की कार्रवाई जारी।
जंतर-मंतर मार्च रोकने के लिए जगह-जगह हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारी • ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच विपक्षी नेताओं पर भी कार्रवाई।
नई दिल्ली। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के तीन नेताओं को रविवार को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के बाद रिहा कर दिया गया। हालांकि, रिहाई के साथ एक साल तक शांति बनाए रखने और अच्छे आचरण की शर्त भी जोड़ी गई है। उधर, प्रदर्शन के दूसरे दिन भी पुलिस की कार्रवाई जारी रही और जंतर-मंतर की ओर मार्च कर रहे कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया गया।
50 हजार रुपये के बांड पर मिली रिहाई।
कॉजपा नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को शनिवार को दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में लिया गया था। रविवार सुबह उन्हें दिल्ली कैंट स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया, जहां 50 हजार रुपये का बांड भरने तथा एक वर्ष तक शांति बनाए रखने और अच्छे आचरण की शर्त पर रिहाई के आदेश दिए गए।
कॉजपा की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने रिहाई की पुष्टि करते हुए कहा कि तीनों नेताओं को एक साल तक शांति भंग नहीं करने की शर्त पर छोड़ा गया है। पार्टी ने इसे बड़ी कानूनी जीत बताते हुए आरोप लगाया कि नेताओं को करीब 24 घंटे तक गैरकानूनी तरीके से एहतियातन हिरासत में रखा गया।
हालांकि, दिल्ली पुलिस का कहना है कि तीनों को आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए एहतियातन गिरफ्तार किया गया था और मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के बाद अदालत की शर्तों पर रिहा किया गया।
दूसरे दिन भी मार्च पर रोक, कई प्रदर्शनकारी हिरासत में।
दिल्ली में प्रदर्शन के दूसरे दिन भी तनावपूर्ण स्थिति बनी रही। कनॉट प्लेस के इनर सर्किल और राजीव चौक से जंतर-मंतर की ओर मार्च कर रहे माकपा सांसद जॉन ब्रिटास सहित कई प्रदर्शनकारियों को सुरक्षाकर्मियों ने हिरासत में ले लिया।
सोशल मीडिया पर सामने आए दृश्यों में प्रदर्शनकारी मार्च करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते दिखाई दिए। इस दौरान पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को रोकने और उन्हें हिरासत में लेने की कार्रवाई भी सामने आई।
प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोकने के लिए राजधानी के विभिन्न स्थानों पर व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शनिवार को 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था। इनमें विपक्ष के कई प्रमुख नेता भी शामिल बताए गए।
विपक्षी नेताओं की हिरासत से बढ़ा विवाद।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार सहित विपक्ष के कई नेताओं को भी प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश के दौरान हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई।
कॉजपा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने नेताओं की रिहाई को लेकर कहा कि आखिरकार दिल्ली पुलिस को उन्हें छोड़ना पड़ा। पार्टी ने अपने राजनीतिक संदेश में कहा, ‘कॉकरोच कभी नहीं मरते।’
अब सवाल कार्रवाई की वैधता और विरोध के अधिकार पर।
इस पूरे घटनाक्रम ने राजधानी में विरोध-प्रदर्शन की अनुमति, पुलिस की एहतियाती कार्रवाई और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर पुलिस कानूनी प्रक्रिया के पालन का दावा कर रही है, वहीं कॉजपा ने हिरासत को गैरकानूनी बताते हुए उसकी वैधता पर सवाल उठाए हैं।
अब ये है बड़ा सवाल: यदि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए एहतियाती कार्रवाई जरूरी थी, तो क्या उसकी प्रक्रिया और आधार को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब दिया जाएगा? लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और पुलिस कार्रवाई की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है।
नोट: हिरासत को गैरकानूनी बताए जाने का दावा कॉजपा का है। पुलिस ने कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बताया है।
