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देवभूमि पर संकट की दस्तक! मानव–पशु संघर्ष पर ठोस नीति की मांग, दिल्ली में गरजे त्रिवेन्द्र!
दर्पण न्यूज 24/7 के लिए विशेष संवाददाता शर्मा की रिपोर्ट |

देहरादून/नई दिल्ली
उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते मानव–पशु संघर्ष को लेकर अब संसद स्तर पर भी चिंता गहराने लगी है। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति की बैठक में यह मुद्दा पूरी गंभीरता से उठा।
बैठक में समिति सदस्य, हरिद्वार सांसद एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने देवभूमि में मानव–पशु संघर्ष को गंभीर, ज्वलंत और संवेदनशील संकट बताते हुए केंद्र सरकार से ठोस और दीर्घकालिक नीति बनाने की पुरजोर मांग की।
आबादी की ओर बढ़ते जंगली जानवर, खतरे की घंटी!
सांसद त्रिवेन्द्र रावत ने कहा कि उत्तराखंड और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली पशुओं का लगातार आबादी वाले इलाकों की ओर पलायन चिंता का विषय बन चुका है। इससे न केवल जन–धन की हानि हो रही है, बल्कि ग्रामीणों का जीवन भी असुरक्षित होता जा रहा है।
उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर मानव–पशु संघर्ष के मूल कारणों की पहचान करने पर जोर दिया, ताकि स्थायी, व्यवहारिक और ज़मीनी समाधान निकाले जा सकें।
रेलवे ट्रैक बने हाथियों के लिए काल!
उत्तराखंड में ट्रेनों से हाथियों की मौत पर गहरी चिंता जताते हुए सांसद रावत ने कहा कि यह सिलसिला बेहद चिंताजनक है। उन्होंने रेल–वन विभाग के बेहतर समन्वय, आधुनिक चेतावनी तंत्र, ट्रेनों की गति नियंत्रण और संरचनात्मक सुरक्षा उपायों को तत्काल मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
एलिफैंट कॉरिडोर पर विशेष फोकस।
बैठक में उत्तराखंड के सभी एलिफैंट कॉरिडोर से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया। त्रिवेन्द्र रावत ने कहा कि वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए प्रभावी संरक्षण उपायों को ज़मीन पर उतारना बेहद जरूरी है, ताकि संघर्ष को रोका जा सके।
समन्वित नीति और तकनीक ही समाधान।
बैठक के दौरान मानव–पशु संघर्ष से निपटने के लिए समन्वित नीति, स्थानीय समुदाय की सहभागिता और तकनीकी हस्तक्षेप जैसे उपायों पर व्यापक विचार–विमर्श किया गया।
बैठक में समिति के अन्य सदस्यगण एवं संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे।
देवभूमि उत्तराखंड के लिए मानव–पशु संघर्ष अब चेतावनी नहीं, बल्कि आपातकाल बनता जा रहा है—और इस पर अब निर्णायक नीति की दरकार है।

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