








“ऑनलाइन अफ़सर, ऑफलाइन दावत; फाइलें चुप, रसीदें बेआवाज़ नहीं!”
वीडियो कॉन्फ्रेंस की बैठक के नाम पर फाइव-स्टार होटल में लाखों खर्च का आरोप, जांच की उठी मांग!
दर्पण न्यूज 24/7 देहरादून।
देवभूमि उत्तराखंड में कथित भ्रष्टाचार का एक और मामला सामने आया है। इस बार आरोप उत्तराखंड वन विभाग और उत्तराखंड वन विकास निगम से जुड़ा है, जहां वीडियो कॉन्फ्रेंस (वीसी) के माध्यम से आयोजित बैठक के बावजूद देहरादून के एक पांच सितारा होटल में सरकारी धन से भारी भरकम खर्च किए जाने का मामला उजागर हुआ है।
प्रकरण के अनुसार, मुख्य वन संरक्षक (उपयोग, गैर-प्रकाष्ठ वन उपज एवं आजीविका), देहरादून द्वारा 24 अक्टूबर 2024 को उत्तराखंड वन विकास निगम से संबंधित लंबित विषयों पर विचार-विमर्श हेतु 25 अक्टूबर 2024 को बैठक प्रस्तावित की गई थी। यह बैठक वन विभाग कार्यालय, वन भवन स्थित वीसी कक्ष से हाई-ब्रिड वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आयोजित होनी थी। बैठक की अध्यक्षता हॉफ (HoFF) द्वारा की जानी थी।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस बैठक से संबंधित पत्र पर न तो कोई पत्रांक अंकित है और न ही उत्तराखंड वन विकास निगम कार्यालय में उसकी विधिवत प्राप्ति दर्ज है। पत्र पर किसी भी उच्च अधिकारी की मार्किंग या स्वीकृति भी नहीं पाई गई। इसके बावजूद तत्कालीन प्रबंध निदेशक, उत्तराखंड वन विकास निगम गिरिजा शंकर पाण्डे द्वारा इसी पत्र के आधार पर देहरादून के राजपुर रोड स्थित पांच सितारा होटल हयात सेंट्रिक को ₹1,64,787 का भुगतान कर दिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब बैठक वन भवन स्थित वीसी कक्ष से ऑनलाइन माध्यम से आयोजित की गई थी और अधिकारियों की उपस्थिति भी वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए होनी थी, तो फिर पांच सितारा होटल में भोजन एवं अन्य व्यवस्थाओं पर सरकारी धन खर्च करने का औचित्य क्या था? क्या यह खर्च पूर्व नियोजित था, या फिर नियमों को ताक पर रखकर बाद में भुगतान कर दिया गया?
मामले को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। जानकारों का कहना है कि यह प्रकरण गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है, जिसकी उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच जरूरी है। साथ ही यह भी सवाल उठ रहे हैं कि बिना विधिवत पत्राचार, बिना अनुमोदन और बिना आधिकारिक स्वीकृति के भुगतान कैसे संभव हुआ।
इस पूरे मामले को नौकरशाही की कथित मनमानी और सरकारी धन के दुरुपयोग का ज्वलंत उदाहरण बताया जा रहा है। जनहित में मांग उठी है कि शासन स्तर पर इस प्रकरण का संज्ञान लिया जाए, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कर जवाबदेही तय की जाए और भविष्य में इस तरह के मामलों पर सख्ती से रोक लगाई जाए।
