








सिर्फ परंपरा नहीं, पहाड़ की आन-बान और जीवंत सांस्कृतिक पहचान है देवीधुरा की बग्वाल!
चार खामों के प्रमुख संभाल रहे पूर्वजों की विरासत, पड़तीदारों के बीच आज भी कायम है मान-सम्मान की परंपरा!
दर्पण न्यूज 24/7 देवीधुरा।
रक्षा बंधन के पावन पर्व पर मां बाराही धाम देवीधुरा में कल सदियों पुरानी ऐतिहासिक बग्वाल की हुंकार गूंजेगी। देश-दुनिया में प्रसिद्ध देवीधुरा की बग्वाल को भले ही पत्थरों की परंपरागत लीला के रूप में जाना जाता हो, लेकिन इसके पीछे आस्था, अनुशासन, सामाजिक व्यवस्था और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत की गहरी कहानी छिपी है। यही वजह है कि बग्वाल महज एक आयोजन नहीं, बल्कि पहाड़ की आन-बान और जीवंत सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
बग्वाल की इस ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत रखने में देवीधुरा की लमगड़िया, वालिक, चम्याल और गहड़वाल चार खामों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। चारों खामों से दर्जनों गांव जुड़े हैं और इन गांवों के लोग परंपरागत रूप से पड़तीदार कहलाते हैं। रक्षा बंधन के दिन यही पड़तीदार अपनी-अपनी खाम के नेतृत्व में मां बाराही धाम पहुंचते हैं और परंपरा के अनुरूप बग्वाल में भाग लेते हैं।
चार खामों के प्रमुख हैं परंपरा के प्रहरी!
देवीधुरा की बग्वाल की सबसे खास बात यह है कि यहां नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल पद नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत मानी जाती है। चारों खामों के वर्तमान प्रमुख अपने पिता और पूर्वजों से मिली जिम्मेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं।
गहड़वाल खाम के प्रमुख त्रिलोक सिंह बिष्ट करीब 15 वर्ष की उम्र से बग्वाल में भाग लेते आ रहे हैं। उनके पिता भोपाल सिंह अनुशासनप्रिय और मृदुभाषी व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे। चारों खामों में गहड़वाल खाम को बड़ी खाम माना जाता है और परंपरागत व्यवस्था में अन्य तीन खामों पर इसका नियंत्रण माना जाता है।
लमगड़िया खाम की कमान वीरेंद्र सिंह लमगड़िया संभाल रहे हैं। वह अन्य खाम प्रमुखों की तुलना में कम उम्र के हैं, लेकिन उनके कंधों पर पीढ़ियों पुरानी जिम्मेदारी है। उनके पिता बहादुर सिंह लमगड़िया अपने समय में अनुशासनप्रिय खाम प्रमुख रहे और बग्वाल की परंपरा के ध्वजवाहक के रूप में पहचाने जाते थे।
वालिक खाम का नेतृत्व बद्री बिष्ट कर रहे हैं। उनके पिता खुशाल सिंह ने लंबे समय तक खाम की कमान संभाली और परंपरा को मजबूती से आगे बढ़ाया। अब बद्री बिष्ट उसी विरासत को आगे ले जा रहे हैं।
वहीं चम्याल खाम के प्रमुख गंगा सिंह अपने पिता गोपाल सिंह की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। बताया जाता है कि गोपाल सिंह जीवन के अंतिम समय तक बग्वाल में भाग लेते रहे। उनके बाद गंगा सिंह ने खाम की जिम्मेदारी संभालकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
पड़तीदारों के बीच आज भी कायम है मान-सम्मान!
खाम प्रमुखों की भूमिका केवल बग्वाल के दिन नेतृत्व करने तक सीमित नहीं है। खाम से जुड़े पड़तीदारों के बीच उनका विशेष सामाजिक और पारंपरिक सम्मान है। धार्मिक एवं पारंपरिक आयोजनों में खाम प्रमुखों की सहमति और दिशा-निर्देशन को महत्वपूर्ण माना जाता है। खाम से जुड़े लोग उनके निर्देशों के अनुसार अपनी जिम्मेदारियों और परंपराओं का निर्वहन करते हैं।
यही व्यवस्था बग्वाल को अनुशासित और परंपरागत स्वरूप प्रदान करती है। चारों खामों के लोग अपने-अपने समूह के साथ मां बाराही धाम पहुंचते हैं और निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार बग्वाल में भाग लेते हैं।
युद्ध नहीं, मां बाराही को प्रसन्न करने वाला पवित्र अनुष्ठान!
देवीधुरा की बग्वाल को केवल युद्ध या संघर्ष के रूप में देखना इस परंपरा के मूल भाव को सीमित करना होगा। स्थानीय आस्था में इसे मां बाराही को प्रसन्न करने वाला पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। बग्वाल में भाग लेने वाले लोगों को भागवाली वीर कहा जाता है और उनके लिए यह आयोजन आस्था एवं परंपरा से जुड़ा हुआ है।
समय के साथ बग्वाल के स्वरूप में बदलाव और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाएं जरूर आई हैं, लेकिन चार खामों की व्यवस्था, पड़तीदारों की भागीदारी और खाम प्रमुखों की जिम्मेदारी आज भी इसकी मूल पहचान का हिस्सा है।
जब गूंजती है बग्वाल की हुंकार, जाग उठती है सदियों पुरानी विरासत!
रक्षा बंधन के दिन मां बाराही धाम में जब बग्वाल की हुंकार गूंजती है तो उसके साथ केवल पत्थरों की आवाज नहीं सुनाई देती, बल्कि सदियों से चली आ रही एक ऐसी परंपरा जीवंत होती है जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संभाला गया है।
चार खामों के प्रमुख अपने पूर्वजों की विरासत के प्रहरी बने हुए हैं, पड़तीदार अपनी खाम के साथ खड़े हैं और नई पीढ़ी इस ऐतिहासिक परंपरा को अपनी आंखों के सामने आगे बढ़ते देख रही है।
यही वजह है कि देवीधुरा की बग्वाल सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि पहाड़ की आन-बान, आस्था और जीवंत सांस्कृतिक पहचान है, जिसकी गूंज हर वर्ष रक्षा बंधन पर देश-दुनिया तक पहुंचती है।
