








लालकुआं-56 में किसका होगा 56 इंच का सीना? 2027 के रण में कौन बनेगा धुरंधर, कौन होगा बागी और कौन बचा पाएगा अपना कुनबा?
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | प्रमोद बमेटा
लालकुआं। विधानसभा क्षेत्र संख्या 56… और चुनावी रण 2027 का। अब सियासी गलियारों में सवाल सिर्फ यह नहीं कि टिकट किसे मिलेगा, बल्कि सवाल यह भी है कि 56 नंबर की इस सीट पर किसका सीना 56 इंच का होगा? कौन अपनी दावेदारी के दम पर बाजी मारेगा, कौन टिकट की दौड़ में पीछे छूटेगा, कौन बगावत का बिगुल बजाएगा और कौन अपने समर्थकों तथा पार्टी के कुनबे को एकजुट रखने में कामयाब होगा?
चुनाव में अभी समय है, लेकिन लालकुआं विधानसभा की सियासी जमीन पर हलचल तेज हो चुकी है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में संभावित दावेदार अपने-अपने तरीके से जनसंपर्क बढ़ाने और राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। चौक-चौराहों से लेकर राजनीतिक बैठकों तक 2027 की चर्चा अब धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगी है।
भाजपा की बात करें तो वर्तमान विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट के सामने इस बार अपनी राजनीतिक पकड़ और जनाधार को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। क्षेत्र में एंटी-इन्कम्बेंसी की चर्चाओं के बीच विधायक की बढ़ती सक्रियता को डैमेज कंट्रोल की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है। उनके समर्थक जहां विकास कार्यों और उपलब्धियों को लेकर जनता के बीच पहुंच रहे हैं, वहीं विधायक स्वयं भी क्षेत्रीय गतिविधियों में लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं।
लेकिन भाजपा का खेल इतना सीधा भी नहीं है। पूर्व विधायक नवीन दुमका अपनी राजनीतिक जमीन और पुराने जनसंपर्क के सहारे सक्रिय हैं। भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश महामंत्री दीपेंद्र कोश्यारी भी लगातार क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। समाजसेवी कमलेश चंदोला भी जनसंपर्क के जरिए अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने सवाल केवल टिकट का नहीं, बल्कि टिकट के बाद पैदा होने वाले संभावित असंतोष को संभालने का भी है।
अगर वर्तमान विधायक पर पार्टी दोबारा भरोसा जताती है तो क्या बाकी दावेदार पूरी ताकत से उनके साथ खड़े होंगे? और यदि पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाती है तो क्या वर्तमान विधायक का खेमा उसी ऊर्जा से चुनावी मैदान में उतर पाएगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है, लेकिन भाजपा की चुनावी रणनीति का बड़ा हिस्सा इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ सकता है।
कांग्रेस में भी तस्वीर कम दिलचस्प नहीं है। वरिष्ठ नेता हरेंद्र बोरा, समाजसेवी हेमवती नंदन दुर्गापाल, युवा नेता शंकर जोशी समेत कई चेहरे अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। बिंदुखत्ता के मुद्दों से जुड़े संघर्षशील चेहरों की भूमिका भी आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।जिसको लेकर प्रमोद कालोनी की सक्रियता भी राजनीतिक चर्चाओं में है। दुग्ध संघ से जुड़कर बिंदुखत्ता के दुग्ध उत्पादकों को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने के प्रयासों और कांग्रेस संगठन में विभिन्न दायित्वों के निर्वहन के कारण वह भी लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने भी टिकट के संभावित दावेदारों को साधकर चुनाव तक एकजुट रखने की चुनौती रहेगी।
दरअसल लालकुआं की सियासत में इस बार असली मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं, बल्कि टिकट के लिए पार्टी के भीतर चलने वाली दावेदारियों के बीच भी दिखाई दे रहा है। टिकट एक होगा और दावेदार कई। लिहाजा टिकट वितरण के बाद किसके चेहरे पर मुस्कान होगी और किसके समर्थकों में मायूसी, यह देखने वाली बात होगी।
यही मायूसी यदि बगावत में बदली तो चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है। मजबूत दावेदार के निर्दलीय मैदान में उतरने से वोटों का बंटवारा किसी भी दल के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। इसलिए दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए 2027 का चुनाव केवल प्रत्याशी चयन की परीक्षा नहीं, बल्कि अपने-अपने कुनबे को एकजुट रखने की भी अग्निपरीक्षा होगा।
लालकुआं के चौक-चौराहों पर चल रही चर्चाओं में परिवर्तन की संभावनाओं की बातें भी सुनाई देने लगी हैं। हालांकि चुनावी नतीजे केवल चर्चाओं से तय नहीं होते, लेकिन जनता के बीच बन रही धारणा राजनीतिक दलों के लिए संकेत जरूर होती है। इस बार स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की एकजुटता और टिकट के बाद होने वाली संभावित बगावत निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि यदि पार्टी अपने सभी संभावित दावेदारों को एक मंच पर लाकर संगठित तरीके से चुनाव मैदान में उतरती है तो मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है। दूसरी ओर भाजपा की चुनौती यह होगी कि संभावित असंतोष और एंटी-इन्कम्बेंसी की चर्चाओं को किस तरह अपने पक्ष में मोड़ा जाए।
ऐसे में 2027 का सवाल अब केवल “मोहन बनाम कौन?” नहीं रह गया है। सवाल है—भाजपा किस पर लगाएगी दांव? कांग्रेस किसे बनाएगी अपना सेनापति? टिकट से वंचित धुरंधर कितने वफादार रहेंगे? कौन बगावत का झंडा उठाएगा? और सबसे बड़ा सवाल—56 नंबर की इस विधानसभा में आखिर किसका होगा 56 इंच का सियासी सीना?
फिलहाल सभी दावेदार अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। समर्थक अपने नेताओं के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं और राजनीतिक दल संभावित समीकरणों को भांपने में जुटे हैं। टिकट का फैसला अभी दूर है, लेकिन लालकुआं में 2027 की पटकथा लिखी जाने लगी है।
अब देखना यही है कि चुनावी रण में कौन धुरंधर मैदान में उतरता है, कौन टिकट से चूकता है, कौन बागी होता है, कौन अपने कुनबे को संभाल पाता है और अंततः 56 नंबर की विधानसभा में 56 इंच का सियासी सीना लेकर कौन ताज तक पहुंचता है।
