








जानिए, पर्दे के पीछे 24 घंटे जागकर जंगल के राजा की हर चाल पर नजर रखने वाले कौन हैं ये ‘अदृश्य प्रहरी’?
12 रेंज से आने वाले आंकड़ों के विश्लेषण से लेकर बाघों की पहचान और कॉर्बेट की संवेदनशील सीमाओं की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी तक—जंगल की सुरक्षा का वह चेहरा, जो आम आंखों से दिखाई नहीं देता!
दर्पण न्यूज 24/7 संवाददाता | करन तिवारी
रामनगर। जंगल का राजा जब घने जंगल में कदम बढ़ाता है तो उसे देखने वालों की नजर शायद ही उस तक पहुंच पाए, लेकिन कॉर्बेट में उसकी हर महत्वपूर्ण हलचल कहीं न कहीं दर्ज हो रही होती है। वह किस इलाके में घूम रहा है, उसकी गतिविधियों में क्या बदलाव आया है, किस कैमरे में उसकी तस्वीर कैद हुई और जंगल के किस हिस्से में वन्यजीवों की सक्रियता बढ़ी—इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए कॉर्बेट में एक ऐसी टीम लगातार काम कर रही है, जो न तो जंगल की पगडंडियों पर नजर आती है और न ही पर्यटकों के सामने।
ये हैं कॉर्बेट के ‘अदृश्य प्रहरी’।
जब जंगल में गश्त करने वाला फ्रंटलाइन स्टाफ पगडंडियों और जंगल के रास्तों पर सुरक्षा का मोर्चा संभाल रहा होता है, उसी समय कॉर्बेट के टाइगर सेल में कंप्यूटर स्क्रीन पर जंगल की दूसरी तस्वीर तैयार हो रही होती है। यहां कैमरों से मिले फुटेज, फील्ड स्टाफ की पेट्रोलिंग से जुड़े आंकड़े और वन्यजीवों की गतिविधियों से संबंधित सूचनाएं एकत्रित कर उनका विश्लेषण किया जाता है।
यानी कॉर्बेट के जंगल की निगरानी केवल आंखों से नहीं, बल्कि डेटा, शोध और तकनीक के जरिए भी की जा रही है।
जंगल की 12 रेंज से निकलकर एक जगह पहुंचता है डेटा
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की सभी 12 रेंज से अलग-अलग सूचनाएं टाइगर सेल तक पहुंचती हैं। पेट्रोलिंग के दौरान बीट गार्ड द्वारा ऐप में दर्ज की जाने वाली जानकारियां भी इस पूरी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
फील्ड से आने वाले आंकड़ों को व्यवस्थित किया जाता है और उनका विश्लेषण किया जाता है। इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिलती है कि जंगल में वन्यजीवों की गतिविधियां किस तरह बदल रही हैं, पेट्रोलिंग किस स्थिति में है और किन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला के अनुसार वन्यजीवों पर शोध कोई एक दिन या एक सीजन की गतिविधि नहीं है। कॉर्बेट जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्र को समझने के लिए लगातार आंकड़े जुटाना, उनका अध्ययन करना और समय के साथ होने वाले बदलावों को समझना जरूरी है।
बाघ सिर्फ दिखाई नहीं देता, पहचाना भी जाता है
कॉर्बेट में बाघों की मौजूदगी का मतलब केवल उनकी संख्या जानना नहीं है। प्रत्येक बाघ की पहचान, उसका क्षेत्र, उसका मूवमेंट और समय के साथ उसकी गतिविधियों में होने वाले बदलाव भी महत्वपूर्ण हैं।
टाइगर सेल में कैमरा ट्रैप और अन्य माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर बाघों का विश्लेषण किया जाता है। किसी बाघ की पहचान सुनिश्चित करने से लेकर उसके मूवमेंट को समझने तक कई स्तरों पर काम होता है।
यही आंकड़े आगे वन्यजीव संरक्षण की रणनीति और शोध के लिए उपयोगी साबित होते हैं।
शोध भी, आंकड़ों का विश्लेषण भी
कॉर्बेट में शोध कार्य को लगातार आगे बढ़ाने के लिए दो शोधकर्ताओं को कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर नियुक्त किया गया है। इसके अलावा रिजर्व के स्थायी कर्मचारी और लंबे समय से शोध एवं संरक्षण कार्य से जुड़े स्टाफ को भी इस व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है।
टाइगर सेल की प्रभारी प्रेमा तिवारी के अनुसार यूनिट कॉर्बेट के रिसर्च एवं शोध विभाग के अंतर्गत काम करती है। यहां दो जेआरएफ भी नियुक्त हैं, जो टाइगर एनालिसिस, रिसर्च और पब्लिकेशन से संबंधित कार्य देखते हैं।
हाथियों और अन्य वन्यजीवों की स्थिति, आबादी में बदलाव, पॉपुलेशन डायनामिक्स तथा दुर्लभ एवं संकटग्रस्त प्रजातियों से संबंधित अध्ययन भी कॉर्बेट में होने वाले शोध का हिस्सा हैं।
कॉर्बेट की सीमा पर भी टिकी हैं नजरें
टाइगर सेल की भूमिका केवल बाघों के डेटा तक सीमित नहीं है। कॉर्बेट की संवेदनशील सीमाओं पर लगाए गए इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम और कैमरों की निगरानी भी इसी व्यवस्था के जरिए की जाती है।
सीमावर्ती क्षेत्रों में लगाए गए कैमरों से मिलने वाले थर्मल और कलर विजन फुटेज को लगातार मॉनिटर किया जाता है। स्क्रीन पर दिखाई देने वाली गतिविधियों पर नजर रखी जाती है ताकि वन्यजीवों की आवाजाही के साथ किसी असामान्य गतिविधि को भी समय रहते पहचाना जा सके।
यह जिम्मेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कॉर्बेट की सीमाएं कई स्थानों पर संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं।
जब जंगल में अंधेरा होता है, तब भी निगरानी बंद नहीं होती
कॉर्बेट की इस इलेक्ट्रॉनिक निगरानी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी 24 घंटे सक्रियता है।
टाइगर सेल में कर्मचारी आठ-आठ घंटे की शिफ्ट में जिम्मेदारी निभाते हैं। दिन में जंगल की तस्वीर कुछ और होती है, रात में कैमरों के थर्मल विजन पर निर्भरता बढ़ जाती है। लेकिन निगरानी का सिलसिला थमता नहीं।
जब जंगल में अंधेरा उतरता है और पगडंडियों पर वनकर्मियों की आवाजाही सीमित हो जाती है, तब स्क्रीन पर कॉर्बेट की निगरानी जारी रहती है।
किसी कैमरे में दिखाई देने वाली हलचल, किसी वन्यजीव का मूवमेंट या सीमावर्ती इलाके में असामान्य गतिविधि—हर संकेत की अपनी अहमियत होती है।
हर कर्मचारी की अलग जिम्मेदारी, मकसद एक
टाइगर सेल में काम करने वाली पूरी टीम की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। कोई डेटा एनालिसिस देखता है, कोई शोध से जुड़ा काम करता है, कोई मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी संभालता है और कुछ कर्मचारी इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस सिस्टम पर नजर रखते हैं।
इन कर्मचारियों का काम भले ही अलग हो, लेकिन सभी की भूमिका कॉर्बेट के संरक्षण और सुरक्षा से जुड़ी हुई है।
यही वजह है कि टाइगर सेल को केवल एक कार्यालय या कंप्यूटर स्क्रीन वाला कमरा मानना कॉर्बेट की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं होगी। यह वह जगह है जहां जंगल में बिखरी सूचनाएं एकत्र होकर एक तस्वीर का रूप लेती हैं।
बाहर से आने वाले शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण कड़ी
कॉर्बेट में केवल विभागीय शोध ही नहीं होते। बाहरी शोध संस्थानों को भी आवश्यकता के अनुसार सहयोग उपलब्ध कराया जाता है। जब कोई शोध संस्था कॉर्बेट में अध्ययन करना चाहती है तो टाइगर सेल और विभागीय टीम उसके साथ समन्वय करती है तथा आवश्यक जानकारी और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराती है।
इस तरह टाइगर सेल फील्ड स्टाफ, आंकड़ों, तकनीक और शोध संस्थानों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है।
जंगल की सुरक्षा की तस्वीर अब बदल रही है
कॉर्बेट की सुरक्षा को यदि केवल जंगल में गश्त करते वनकर्मियों की तस्वीर से समझा जाए तो कहानी अधूरी रह जाएगी।
एक तरफ वनकर्मी जंगल के भीतर जमीन पर मोर्चा संभालते हैं, दूसरी तरफ टाइगर सेल के कर्मचारी कंप्यूटर स्क्रीन पर उसी जंगल की गतिविधियों को पढ़ते हैं। फील्ड से निकलने वाला डेटा यहां पहुंचता है, कैमरों की तस्वीरें यहां देखी जाती हैं, बाघों की पहचान का विश्लेषण होता है और शोध के लिए आंकड़ों को व्यवस्थित किया जाता है।
यानी कॉर्बेट की सुरक्षा अब सिर्फ जंगल में चलने वाली निगरानी नहीं, बल्कि जंगल से स्क्रीन तक फैला हुआ एक पूरा नेटवर्क है।
दिखाई नहीं देते, लेकिन हर पल मौजूद हैं
कॉर्बेट के ये ‘अदृश्य प्रहरी’ पर्यटकों को जंगल में गश्त करते हुए शायद ही दिखाई दें। इनके हाथ में बंदूक लेकर जंगल की पगडंडी पर चलने की तस्वीर भी सामने नहीं आती। इनके सामने है कंप्यूटर स्क्रीन, कैमरों से आती तस्वीरें, आंकड़ों की फाइलें और जंगल की लगातार बदलती गतिविधियों का विश्लेषण।
लेकिन जब कोई बाघ कैमरे के सामने से गुजरता है, जब किसी वन्यजीव की गतिविधि बदलती है या जब कॉर्बेट की संवेदनशील सीमा पर कोई असामान्य हलचल दिखाई देती है, तो इनकी नजर वहां पहुंच जाती है।
यही कॉर्बेट की सुरक्षा की वह अनदेखी कहानी है, जहां जंगल के राजा की निगरानी केवल जंगल में नहीं होती—उसकी हर अहम चाल को डेटा, कैमरों और शोध के जरिए पढ़ने वाले ये ‘अदृश्य प्रहरी’ पर्दे के पीछे 24 घंटे जागते रहते हैं।
