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बिंदुखत्ता का राजस्व ग्राम मुद्दा बना लालकुआं विधानसभा का सबसे बड़ा चुनावी सवाल!
दशकों से भाजपा-कांग्रेस की सियासत के केंद्र में रहा सवाल, अब संगठनों की पदयात्रा ने फिर गरमाया माहौल, 2027 में जनता पूछेगी—वादा करने वाले बहुत, हक दिलाने वाला कौन?
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | प्रमोद बमेटा
लालकुआं। लालकुआं विधानसभा में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ एक पुराना मुद्दा फिर सियासी तापमान बढ़ाने लगा है। बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम का दर्जा देने की मांग अब केवल सरकारी फाइलों और चुनावी घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय सड़क पर उतर चुकी है। 15 अगस्त से विभिन्न संगठनों की संयुक्त पदयात्रा लगातार गांव-गांव पहुंच रही है और जिस तरह ग्रामीणों के साथ स्कूली बच्चे भी इस अभियान में दिखाई दे रहे हैं, उसने इस मुद्दे को एक बार फिर लालकुआं की सियासत के केंद्र में ला खड़ा किया है।
सवाल अब केवल इतना नहीं है कि बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम का दर्जा कब मिलेगा। बड़ा सवाल यह है कि दशकों से जिस मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही समय-समय पर जनता के बीच पहुंचती रही हैं, 2027 के चुनाव में उसकी सियासी कीमत कौन चुकाएगा और इसका राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा?
वन अधिकार संगठन, पूर्व सैनिक संगठन, राज्य आंदोलनकारी संगठन और गौला संघर्ष समिति समेत कई संगठनों के संयुक्त अभियान ने साफ संकेत दे दिया है कि बिंदुखत्ता का सवाल इस बार केवल किसी एक संगठन की मांग नहीं रहने वाला। बुधवार की पदयात्रा संजयनगर-2 स्थित जगदंबा मंदिर पहुंची, जहां रात में कीर्तन-भजन और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से लोगों को जागरूक करने की तैयारी है। इसके बाद पदयात्रा रावतनगर की ओर बढ़ेगी। वहीं 27 सितंबर को लालकुआं तहसील में प्रस्तावित रैली को लेकर भी लोगों से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचने की अपील की जा रही है।
हर चुनाव में गर्माया मुद्दा, लेकिन समाधान अब भी सवाल!
बिंदुखत्ता का राजस्व ग्राम का दर्जा लालकुआं विधानसभा के उन मुद्दों में शामिल है, जिसकी चर्चा चुनाव आते ही तेज हो जाती है। राजनीतिक दलों के नेता इस मांग के समर्थन में आवाज उठाते रहे हैं, आश्वासन भी सामने आते रहे हैं और ग्रामीणों की उम्मीदें भी हर बार जगती रही हैं। लेकिन चुनावी मौसम गुजरते ही सवाल फिर वही रह जाता है—आखिर बिंदुखत्ता को उसका अधिकार कब मिलेगा?
यही वजह है कि इस बार ग्रामीण संगठनों की सक्रियता को राजनीतिक दलों के लिए सामान्य आंदोलन मानना आसान नहीं होगा। 2027 में मतदाता जब ईवीएम का बटन दबाएगा तो विकास, सड़क, बिजली, पानी और रोजगार जैसे मुद्दों के साथ बिंदुखत्ता के राजस्व ग्राम का सवाल भी राजनीतिक दलों की परीक्षा ले सकता है।
भाजपा-कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं होगी राह
लालकुआं विधानसभा में लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा राजनीतिक मुकाबला रहा है। दोनों दलों की अपनी मजबूत सांगठनिक पकड़ और जनाधार है। लेकिन बिंदुखत्ता का मुद्दा ऐसा है, जिसमें दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ग्रामीणों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
यही कारण है कि अब दोनों प्रमुख दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे इस मुद्दे को केवल चुनावी भाषण का हिस्सा बनाते हैं या इसके समाधान की ठोस राजनीतिक और प्रशासनिक रूपरेखा जनता के सामने रखते हैं।
जनता के बीच अब यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि जब वर्षों से सत्ता में रहे और विपक्ष में बैठे दोनों प्रमुख दल इस मांग के पक्ष में अपनी-अपनी आवाज उठाते रहे हैं, तो फिर समाधान की अंतिम मंजिल इतनी दूर क्यों है?
इस बार सियासी खिचड़ी कौन खाएगा?
बिंदुखत्ता का मुद्दा जितना पुराना है, उतना ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी। इसीलिए 2027 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे की पक रही सियासी खिचड़ी का पहला निवाला किसे मिलता है।
क्या भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने के लिए कोई बड़ा दांव चलेगी?
क्या कांग्रेस जनता को यह भरोसा दिलाने में सफल होगी कि सत्ता में आने पर वह वर्षों पुराने सवाल का स्थायी समाधान करेगी?
क्या उत्तराखंड क्रांति दल इस मुद्दे को क्षेत्रीय अस्मिता और राज्य आंदोलन की भावना से जोड़कर अपनी जमीन मजबूत कर पाएगा?
और क्या अन्य छोटे दल या नए राजनीतिक समीकरण बिंदुखत्ता के सवाल को अपने पक्ष में मोड़ पाएंगे?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन इतना तय है कि बिंदुखत्ता अब सिर्फ राजस्व ग्राम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि 2027 के लालकुआं विधानसभा चुनाव का संभावित सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।
पदयात्रा ने दिया राजनीतिक दलों को संदेश!
15 अगस्त से शुरू हुई संयुक्त पदयात्रा को इसी लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचकर लोगों को जोड़ना, नारे लगाना, नुक्कड़ नाटक और जनजागरूकता कार्यक्रम करना तथा 27 सितंबर की प्रस्तावित तहसील रैली के लिए समर्थन जुटाना इस आंदोलन को चुनावी माहौल से पहले ही जनसरोकार का रूप दे रहा है।
अब देखना यह होगा कि राजनीतिक दल इस बढ़ती सक्रियता को किस नजरिए से देखते हैं। क्या वे इसे केवल आंदोलन मानकर आगे बढ़ेंगे या फिर बिंदुखत्ता के मतदाताओं की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं को समझते हुए कोई निर्णायक पहल करेंगे?
क्योंकि 2027 में सवाल केवल यह नहीं होगा कि किस दल को वोट मिलेगा। असली सवाल शायद यह होगा—जिस बिंदुखत्ता के नाम पर दशकों से सियासत होती रही, आखिर इस बार उसकी पक रही सियासी खिचड़ी कौन खाएगा और जनता के हिस्से में फिर आश्वासन आएगा या अधिकार?

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