








सिख सम्मेलन से तराई साधेगी बीजेपी या फिर उठेंगे पुराने सवाल?
नितिन नवीन और सीएम धामी की मौजूदगी के बीच 2027 का सियासी गणित, भूमि अधिकार से गन्ना मूल्य तक कई मुद्दों पर रहेगी नजर!
दर्पण न्यूज 24/7| बाजपुर
रुद्रपुर में प्रस्तावित सिख सम्मेलन को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की तराई रणनीति के अहम हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मौजूदगी इस आयोजन को राजनीतिक रूप से खास बना रही है। हालांकि, असली सवाल सम्मेलन की भव्यता नहीं, बल्कि यह है कि तराई के सिख-पंजाबी समाज के बीच बीजेपी किन सवालों के जवाब लेकर पहुंचती है?
18 दिसंबर 2023 को रुद्रपुर में हुए युवा सिख सम्मेलन में भी समुदाय की अच्छी भागीदारी हुई थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तराखंड की सभी पांच लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। अब विधानसभा चुनाव से पहले उसी सामाजिक आधार के बीच दोबारा पहुंच बनाने की कवायद को 2027 की चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
‘मिनी पंजाब’ में सियासी भरोसे की चुनौती।
ऊधमसिंह नगर और आसपास का तराई इलाका लंबे समय से ‘मिनी पंजाब’ के तौर पर पहचाना जाता है। यहां सिख-पंजाबी समाज खेती-किसानी के साथ व्यापार और स्थानीय राजनीति में भी प्रभावी भूमिका निभाता है। लिहाजा इस समुदाय का रुख विधानसभा चुनाव के समीकरणों पर असर डाल सकता है।
बीजेपी के सामने हालांकि सबसे बड़ी चुनौती आश्वासन और उसके परिणाम के बीच की दूरी है।
बाजपुर के 20 गांवों की 5838 एकड़ भूमि के भूमिधरी अधिकार का मुद्दा सिख-किसान समाज के बीच लंबे समय से चर्चा में है। 2023 में समाधान का भरोसा दिया गया था। ऐसे में सम्मेलन के मंच से इस मामले में कोई ठोस पहल होती है या फिर एक बार फिर आश्वासन मिलता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
क्या इस बार भूमि अधिकार के सवाल पर बीजेपी कोई ठोस संदेश दे पाएगी?
गन्ना मूल्य और भुगतान भी बड़ी कसौटी
तराई के किसान के लिए गन्ने का मूल्य और समय पर भुगतान सीधे उसकी आर्थिक स्थिति से जुड़ा मुद्दा है। पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर बेहतर गन्ना मूल्य की मांग, चीनी मिलों की स्थिति और किसानों के भुगतान जैसे विषय राजनीतिक भाषणों से आगे ठोस नीति और फैसलों की मांग करते हैं।
दिल्ली किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि के बाद इन मुद्दों की राजनीतिक संवेदनशीलता और बढ़ी है। इसके अलावा हरिद्वार में ज्ञान गोदड़ी साहिब का सवाल, पंजाब-हरियाणा से बेहतर रेल संपर्क और पंजाबी समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक अपेक्षाएं भी बीजेपी के संवाद की अहम कसौटी हो सकती हैं।
भीड़ से ज्यादा अहम होंगे सवालों के जवाब।
राजनीतिक सम्मेलनों में भीड़ को अक्सर शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इस सम्मेलन का असर सिर्फ भीड़ से तय नहीं होगा। असली परीक्षा यह होगी कि मंच से उठने वाले सवालों पर सरकार और बीजेपी संगठन कितना स्पष्ट जवाब देते हैं और उसके बाद जमीन पर कितना काम दिखाई देता है।
2027 से पहले तराई में सिख-पंजाबी मतदाताओं तक पहुंच बनाने की बीजेपी की कोशिश इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां चुनावी समीकरण केवल नारों से नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों और भरोसे की जमीन पर तय होते हैं।
नितिन नवीन का रुद्रपुर पहुंचना बीजेपी की तराई को लेकर प्राथमिकता का संकेत है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी इस संदेश को और मजबूत करेगी।
लेकिन अंतिम सवाल यही है—
क्या सिख सम्मेलन बीजेपी और सिख-पंजाबी समाज के बीच नया भरोसा कायम करेगा?
क्या पुराने आश्वासन इस बार ठोस फैसलों में बदलेंगे?
या फिर 2027 की चुनावी आहट के बीच सम्मेलन के बाद भी तराई में वही पुराने सवाल बीजेपी से जवाब मांगते रहेंगे?
