

बेहड़ को पड़ा थप्पड़, मतपेटियों ने दिया जवाब!
थप्पड़ कांड से गरमाई किच्छा की सियासत, मतगणना में कांग्रेस के खाते में गए किच्छा और सिरौलीकलां के अध्यक्ष पद।
दर्पण न्यूज 24/7 किच्छा। किच्छा की सियासत में विधायक तिलक राज बेहड़ और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के बीच लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक रस्साकशी नगर निकाय चुनाव के दौरान एक बार फिर खुलकर सामने आई। मतदान के बाद स्ट्रांग रूम के बाहर विधायक बेहड़ को थप्पड़ मारे जाने की घटना ने चुनावी माहौल को अचानक गरमा दिया। विवाद ने इतना तूल पकड़ा कि निकाय चुनाव की चर्चा प्रत्याशियों और स्थानीय मुद्दों से आगे बढ़कर दो राजनीतिक खेमों के वर्चस्व तक पहुंच गई। मगर सात अक्टूबर को जब मतपेटियां खुलीं तो कहानी का अगला अध्याय मतदाताओं ने अपने तरीके से लिख दिया। किच्छा और सिरौलीकलां, दोनों नगर पालिकाओं के अध्यक्ष पद कांग्रेस की झोली में चले गए।
किच्छा में कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह ने भाजपा प्रत्याशी संदीप अरोड़ा को पराजित किया, जबकि सिरौलीकलां में कांग्रेस प्रत्याशी राशिदा बेगम ने निर्दलीय फरहीन जहां को भारी मतों के अंतर से शिकस्त दी। इस तरह जिस चुनाव को लेकर मतदान के बाद राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया था, उसके परिणाम ने कांग्रेस के लिए दोनों निकायों में अध्यक्ष पद का रास्ता खोल दिया।
इस चुनाव की सबसे चर्चित घटना 22 सितंबर को मतदान के बाद सामने आई थी। नई मंडी स्थित स्ट्रांग रूम परिसर में मतपेटियों को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते दोनों पक्षों के समर्थकों के आमने-सामने आने तक पहुंच गया। इसी दौरान विधायक तिलक राज बेहड़ को थप्पड़ मारे जाने का आरोप लगा। घटना के बाद पुलिस ने धीरज कुमार को गिरफ्तार किया था। उसे भाजपा किसान मोर्चा का जिला मंत्री और पूर्व विधायक राजेश शुक्ला का करीबी बताया गया। विवाद के बाद दोनों पक्षों से जुड़े करीब 30 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात भी सामने आई थी।
थप्पड़ की घटना के बाद किच्छा का चुनाव अचानक स्थानीय निकाय की सामान्य राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया। बेहड़ और शुक्ला के बीच पुराने राजनीतिक संघर्ष के कारण इस घटना को दोनों खेमों के बीच वर्चस्व की लड़ाई से जोड़कर देखा जाने लगा। चुनाव परिणाम को लेकर भी राजनीतिक हलकों में उत्सुकता इसलिए बढ़ गई थी कि आखिर मतदाता इस पूरे घटनाक्रम के बाद किसके पक्ष में अपना फैसला सुनाते हैं।
सात अक्टूबर को मतगणना शुरू हुई तो तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगी। किच्छा में कांग्रेस प्रत्याशी राजेश प्रताप सिंह की जीत ने भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर झटका दिया, जबकि सिरौलीकलां में भी कांग्रेस की राशिदा बेगम की जीत ने पार्टी की स्थिति को और मजबूत कर दिया। दो निकायों में कांग्रेस की जीत ने विधायक बेहड़ के समर्थकों को राजनीतिक बढ़त का दावा करने का मौका जरूर दिया है।
किच्छा के राजनीतिक समीकरणों में इस परिणाम की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि यहां नगर निकाय चुनाव को लंबे समय से चल रही बेहड़ बनाम शुक्ला की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा था। ऐसे में चुनाव के दौरान बेहड़ को थप्पड़ मारे जाने की घटना और उसके बाद कांग्रेस प्रत्याशी की जीत ने पूरे घटनाक्रम को एक अलग राजनीतिक अर्थ दे दिया है।
हालांकि नगर निकाय चुनाव को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव का पैमाना मानना उचित नहीं होगा। निकाय चुनाव में स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी, व्यक्तिगत संपर्क और वार्ड स्तर के समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बावजूद इसके, ऐसे परिणाम स्थानीय राजनीतिक संगठनों और नेताओं की पकड़ को लेकर बहस जरूर खड़ी करते हैं।
किच्छा में अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नगर पालिका की कुर्सी किसके पास गई। सवाल यह भी है कि जिस चुनाव में स्ट्रांग रूम के बाहर हुआ विवाद सबसे बड़ी सियासी सुर्खी बना, उसी चुनाव के अंत में मतपेटियों ने किस राजनीतिक संदेश को जन्म दिया।
बेहड़ पर हाथ उठने की घटना ने जिस चुनाव को गरमा दिया था, उसका अंतिम फैसला हाथापाई से नहीं, बल्कि मतदाताओं के वोट से हुआ। और इस फैसले में किच्छा के साथ सिरौलीकलां में भी कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर कब्जे ने स्थानीय राजनीति की तस्वीर जरूर बदल दी है।
अब किच्छा की सियासत में चर्चा इस बात की है कि थप्पड़ कांड के बाद जिस जनादेश का इंतजार था, उसने विधायक तिलक राज बेहड़ के राजनीतिक खेमे को अपनी बात कहने का नया अवसर दे दिया है। दूसरी ओर भाजपा और शुक्ला समर्थकों के सामने भी इन परिणामों के बाद स्थानीय स्तर पर संगठन और चुनावी रणनीति को लेकर मंथन की स्थिति बन सकती है।
थप्पड़ की चोट कुछ क्षणों की थी, लेकिन सात अक्टूबर की मतगणना ने किच्छा की सियासत में उसकी राजनीतिक गूंज को लंबा कर दिया है। अब यह गूंज 2027 की ओर बढ़ती राजनीतिक हलचल में कितनी दूर तक जाती है, इस पर किच्छा की निगाहें टिकी रहेंगी।
