

फिर एक घातक वायरस के साये में दुनिया!
साइबेरिया की लैब में महिला तकनीशियन की मौत ने जगाई आशंका, लेकिन अफवाह और तथ्य के बीच फर्क जरूरी
दर्पण न्यूज 24/7
कोविड-19 की भयावह यादें अभी दुनिया की सामूहिक स्मृति से पूरी तरह मिट भी नहीं पाई हैं कि रूस के साइबेरिया से आई एक घटना ने एक बार फिर महामारी की आशंका को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इरकुत्स्क क्षेत्र के शेलेखोव में एक एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की 23 वर्षीय महिला लैब तकनीशियन की मौत और उसके बाद अस्पताल के स्टाफ को क्वारंटीन किए जाने की खबरों ने स्वाभाविक रूप से लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या वास्तव में कोई नया घातक संक्रमण फैल रहा है या फिर एक संदिग्ध चिकित्सकीय घटना को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म हो गया है?
रूस की स्वास्थ्य निगरानी संस्था रोस्पोट्रेबनादजोर का कहना है कि महिला की मौत प्लेग से नहीं, बल्कि अज्ञात निमोनिया से हुई और जांच में किसी घातक रोगजनक की पुष्टि नहीं हुई है। संस्था ने यह भी कहा है कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला जिससे बीमारी को उन रोगजनकों से जोड़ा जा सके, जिनके साथ संबंधित कर्मचारी काम करती थीं।
दूसरी ओर, पड़ोसी बुरियाटिया के प्रमुख एलेक्सी त्सिदेनोव की ओर से प्लेग की आशंका जताए जाने की खबर सामने आई। यही विरोधाभासी दावे चिंता को और बढ़ाते हैं। ऐसे में आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि आधिकारिक जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
प्लेग का नाम ही काफी है डर पैदा करने के लिए।
प्लेग कोई नया रोग नहीं है। इसका कारण यर्सिनिया पेस्टिस नामक जीवाणु है। इसके विभिन्न रूपों में न्यूमोनिक प्लेग सबसे गंभीर माना जाता है। इसमें तेज बुखार, कमजोरी, सिरदर्द, सांस लेने में परेशानी और खांसी जैसे लक्षण हो सकते हैं। उपचार में देरी होने पर यह गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है—प्लेग का अस्तित्व और महामारी फैलने की स्थिति एक ही बात नहीं है। आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में समय पर पहचान और उपयुक्त एंटीबायोटिक उपचार उपलब्ध होने के कारण स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
यही कारण है कि साइबेरिया की घटना को लेकर दुनिया में सतर्कता जरूरी है, लेकिन दहशत नहीं।
कोविड की त्रासदी से दुनिया ने क्या सीखा?
कोविड-19 के दौरान दुनिया ने देखा कि किसी संक्रामक बीमारी की खबर किस तेजी से भय में बदल सकती है। स्कूल बंद हुए, कारोबार प्रभावित हुए, करोड़ों लोगों की दिनचर्या बदल गई और लंबे समय तक लोग घरों में रहने को मजबूर हुए।
उस दौर ने एक और सबक दिया—महामारी में वायरस जितना खतरनाक होता है, गलत सूचना और अफवाहें कई बार उससे कम खतरनाक नहीं होतीं।
सोशल मीडिया के दौर में किसी अस्पताल में क्वारंटीन, मास्क की अनिवार्यता या कुछ चिकित्सा संस्थानों में अस्थायी प्रतिबंध की खबर देखते ही उसे ‘नया वायरस फैल गया’ मान लेना बेहद आसान है। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी मामलों में आधिकारिक जांच और वैज्ञानिक प्रमाणों के बिना ऐसी धारणाएं लोगों में अनावश्यक भय पैदा कर सकती हैं।
लैब सुरक्षा पर फिर उठे सवाल।
फिर भी इस पूरे घटनाक्रम को केवल अफवाह कहकर खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा।
यदि वास्तव में किसी प्रयोगशाला में संक्रामक जीवाणु से जुड़ी दुर्घटना हुई है, तो यह बायोसेफ्टी और लैब प्रोटोकॉल से जुड़ा गंभीर विषय है। उच्च जोखिम वाले रोगजनकों पर काम करने वाली प्रयोगशालाओं में सुरक्षा की छोटी-सी चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
इतिहास में प्रयोगशाला दुर्घटनाओं से संक्रमण फैलने की घटनाएं सामने आती रही हैं। 1967 में जर्मनी के मारबर्ग में अफ्रीकी हरे बंदरों से जुड़े शोध के दौरान मारबर्ग वायरस का संक्रमण शोधकर्ताओं तक पहुंचा था। 1978 में ब्रिटेन के बर्मिंघम में प्रयोगशाला से स्मॉलपॉक्स संक्रमण की घटना ने भी पूरी दुनिया को लैब सुरक्षा के महत्व का एहसास कराया।
हालांकि कोविड-19 की उत्पत्ति को लेकर प्रयोगशाला-लीक की परिकल्पना पर आज भी वैज्ञानिक और राजनीतिक स्तर पर बहस जारी है। इसलिए किसी भी नए मामले को पुराने विवादों से जोड़कर निष्कर्ष निकालने के बजाय ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों की प्रतीक्षा करना ही जिम्मेदार पत्रकारिता है।
दुनिया को डर नहीं, पारदर्शिता चाहिए।
रूस में अस्पतालों में निगरानी, क्वारंटीन और एहतियाती कदमों की खबरों के बीच सबसे ज्यादा जरूरत पारदर्शी सूचना की है। यदि कोई संक्रमण है तो उसका नाम, स्रोत, संक्रमण की प्रकृति, प्रभावित लोगों की संख्या और उसके फैलने की वास्तविक क्षमता स्पष्ट की जानी चाहिए।
अमेरिका सहित अन्य देशों की निगरानी और सीमा पर स्वास्थ्य संबंधी सतर्कता इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेता है। लेकिन निगरानी को महामारी की पुष्टि मान लेना भी सही नहीं है।
भारत के लिए भी यही संदेश महत्वपूर्ण है। फिलहाल किसी भी संभावित अंतरराष्ट्रीय संक्रमण की खबर पर घबराने के बजाय स्वास्थ्य एजेंसियों को वैज्ञानिक आधार पर निगरानी मजबूत रखनी चाहिए।
सवाल सिर्फ एक महिला की मौत का नहीं।
इस घटना ने एक बड़ा सवाल फिर सामने ला दिया है—क्या दुनिया अगली महामारी के लिए वास्तव में तैयार है?
कोविड के बाद भी यदि उच्च जोखिम वाले रोगजनकों पर काम करने वाली प्रयोगशालाओं की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय सूचना साझेदारी और आपातकालीन स्वास्थ्य तंत्र में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं, तो दुनिया को इन्हें गंभीरता से लेना होगा।
क्योंकि अगली महामारी कब और कहां से आएगी, यह कोई नहीं जानता। लेकिन उससे निपटने की तैयारी आज से ही की जा सकती है।
साइबेरिया की घटना में यदि प्लेग की पुष्टि नहीं होती तो भी इससे निकला सबक महत्वपूर्ण रहेगा। और यदि कोई गंभीर संक्रमण सामने आता है, तब भी दुनिया को सबसे पहले सटीक सूचना, वैज्ञानिक जांच और त्वरित स्वास्थ्य कार्रवाई की जरूरत होगी—न कि अफवाहों, सनसनी और भय की।
दहशत से बीमारी नहीं रुकती।
सतर्कता, विज्ञान और पारदर्शिता ही किसी महामारी के खिलाफ पहली ढाल हैं।
— साभार : वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला
