खबरें शेयर करें -

यूसीएफ की सोयाबीन फैक्ट्री ध्वस्तीकरण प्रकरण गड्ढों के साथ सवालों को भी मलबे में दबाने की कोशिश में यूसीएफ प्रबंधन?

खुदाई पर सवाल, गड्ढों की भराई और जांच का इंतजार, प्रबंधन की भूमिका पर उठ रहे सवाल, उपखनिज का हिसाब अब भी नहीं हुआ स्पष्ट !

लालकुआं। यूसीएफ के सोयाबीन एवं वनस्पति कॉम्प्लेक्स में ध्वस्तीकरण के दौरान हुई खुदाई और उपखनिज जैसी सामग्री निकलने को लेकर उठे सवाल अब एक नए मोड़ पर हैं। गहरे गड्ढों को मलबे से भरने की कार्रवाई, सामग्री के निस्तारण से जुड़े सवाल और पहले से चल रही विभागीय एवं प्रशासनिक जांच के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पूरे प्रकरण की वास्तविक तस्वीर सामने कब आएगी?

प्रबंधन की ओर से गड्ढों को भवनों की फाउंडेशन निकालने का परिणाम बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि यदि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार हुई है, तो खुदाई की गहराई, निकली सामग्री की मात्रा और उसके निस्तारण का स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है? पारदर्शिता के लिए जरूरी अभिलेख और तथ्य सामने आने चाहिए, ताकि संदेह की गुंजाइश समाप्त हो सके।

मामले में गड्ढों को भरने की कार्रवाई ने भी सवालों को और गंभीर बनाया है। जब ध्वस्तीकरण और उपखनिज को लेकर शिकायतें जांच के दायरे में हैं, तब यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि मौके से जुड़े साक्ष्य सुरक्षित हैं और जांच एजेंसियां वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन कर सकती हैं। गड्ढों की भराई अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसके समय और परिस्थितियों की जांच जरूरी है।

जिलाधिकारी के निर्देश पर खनन विभाग की टीम निरीक्षण कर चुकी है। एसडीएम लालकुआं स्तर पर प्रशासनिक पड़ताल और यूसीएफ की विभागीय जांच भी इस प्रकरण से जुड़ी हैं। ऐसे में अब केवल निरीक्षण और जांच की जानकारी पर्याप्त नहीं होगी। यह भी सामने आना चाहिए कि जांच में किन बिंदुओं की पड़ताल हुई, कौन से अभिलेख उपलब्ध कराए गए और खुदाई से निकली सामग्री के संबंध में क्या तथ्य मिले।

यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है, तो पूरा हिसाब सामने क्यों नहीं?

यह सवाल किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है। परिसर से सामग्री बाहर ले जाए जाने की शिकायतों के बीच 18 सितंबर से पहले और बाद के रिकॉर्ड का मिलान, सामग्री की मात्रा का आकलन तथा उसके निस्तारण की प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण है।

फिलहाल उपखनिज निकालने या बेचे जाने के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में प्रबंधन पर प्रकरण को दबाने का निष्कर्ष निकालने के बजाय उसके स्पष्टीकरण, अभिलेखों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

अब सवाल केवल यह नहीं कि गड्ढे क्यों खोदे गए और क्यों भरे गए। सवाल यह भी है कि पूरे प्रकरण का तथ्यात्मक हिसाब कब सामने आएगा। यदि प्रबंधन पारदर्शिता के साथ सभी रिकॉर्ड उपलब्ध कराता है, तो संदेह दूर हो सकता है; और यदि अभिलेखों में कोई विसंगति मिलती है, तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

गड्ढे मलबे से भर सकते हैं, लेकिन सवालों का जवाब दिए बिना संदेह खत्म नहीं होंगे। अब निगाहें जांच पर हैंक्या सच सामने आएगा या मामला फाइलों के बीच उलझकर रह जाएगा?

उत्तराखंड