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आंगन में दादी के सामने खेल रहा था रियांशु, झाड़ियों में मिला शव!

गंगोलीहाट में दिनदहाड़े गुलदार का हमला, मानव-वन्यजीव संघर्ष के दावों पर फिर उठे सवाल!

गंगोलीहाट। मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के सरकारी दावों के बीच गंगोलीहाट में दस वर्षीय मासूम रियांशु की दर्दनाक मौत ने व्यवस्था के सामने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है—जब गुलदार आबादी के बीच दिनदहाड़े पहुंचकर बच्चे को घर के आंगन से उठा ले जाए, तो आखिर वन विभाग की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था कहां थी?

तहसील मुख्यालय से करीब आठ किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत भंडारीगांव में शनिवार को रियांशु पुत्र भगवान राम अपनी दादी के सामने घर के आंगन में खेल रहा था। इसी दौरान गुलदार ने उस पर हमला कर दिया और उसे खींचकर ले गया। परिजनों और ग्रामीणों ने शोर मचाते हुए तलाश शुरू की तो कुछ दूरी पर झाड़ियों में मासूम का शव बरामद हुआ। शव घर से करीब 200 मीटर और मुख्य सड़क से लगभग 250 मीटर दूर मिला।

दस साल का रियांशु मजदूर भगवान राम का छोटा बेटा था। परिवार में उसका 12 वर्षीय बड़ा भाई दिव्यांशु है। मासूम की मौत ने परिवार को तोड़कर रख दिया है। जिस आंगन में कुछ देर पहले बच्चे की आवाज गूंज रही थी, वहीं अब मातम पसरा है।

घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंचीं। वन दरोगा देवेंद्र सिंह महरा के नेतृत्व में वन विभाग की टीम ने घटनास्थल का जायजा लिया, जबकि कोतवाली पुलिस ने भी मौके पर पहुंचकर कार्रवाई शुरू की।

लेकिन इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गुलदार ने हमला क्यों किया। सवाल यह है कि जब क्षेत्र में गुलदार की सक्रियता पहले से बनी हुई थी, तब संभावित खतरे को रोकने के लिए क्या किया गया?

ग्राम प्रधान दान सिंह मेहता के मुताबिक क्षेत्र में लंबे समय से गुलदार की सक्रियता से ग्रामीण दहशत में हैं। उन्होंने 25 सितंबर को जनता दरबार में जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर क्षेत्र को गुलदार के आतंक से निजात दिलाने की मांग भी की थी। इसके बावजूद कुछ ही दिन बाद आबादी के बीच एक बच्चे की जान चली गई।

यानी शिकायत पहले पहुंची, खतरे की आशंका पहले से थी, ग्रामीणों ने चेताया भी था—लेकिन सुरक्षा का इंतजाम कितना कारगर था, रियांशु की मौत ने उसकी पोल खोल दी।

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष कोई नया संकट नहीं है। पहाड़ों में गुलदार और अन्य वन्यजीवों की आबादी वाले क्षेत्रों में घुसपैठ लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। सरकार और वन विभाग की ओर से समय-समय पर गश्त, निगरानी, कैमरा ट्रैप, पिंजरा लगाने और हिंसक वन्यजीवों को पकड़ने जैसी कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन भंडारीगांव की घटना यह पूछने को मजबूर करती है कि इन तमाम व्यवस्थाओं का असर आखिर आबादी तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा?

यह भी सवाल महत्वपूर्ण है कि जिस क्षेत्र में ग्रामीण पहले ही गुलदार की सक्रियता की शिकायत कर चुके थे, वहां संवेदनशील स्थानों की पहचान, नियमित निगरानी और ग्रामीणों को तत्काल सुरक्षा संबंधी चेतावनी देने की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।

ग्रामीणों का आक्रोश अब वन विभाग पर है। उनकी मांग है कि पीड़ित परिवार को तत्काल उचित मुआवजा दिया जाए और इंसानी जान के लिए खतरा बने गुलदार को आदमखोर घोषित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

रियांशु की मौत एक परिवार का निजी दुख भर नहीं है। यह उस संघर्ष की भयावह तस्वीर है जिसमें एक तरफ जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण की जिम्मेदारी है तो दूसरी तरफ जंगल की सीमा से सटे गांवों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा का सवाल। वन्यजीवों को बचाना जरूरी है, लेकिन उन गांवों के बच्चों की सुरक्षा भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है, जो जंगल और आबादी के बीच की धुंधली होती सीमा पर जिंदगी जी रहे हैं।

 

रियांशु अब वापस नहीं आएगा। लेकिन उसकी मौत व्यवस्था से यह सवाल जरूर पूछ रही है—खतरे की सूचना मिलने के बाद भी अगर एक बच्चा अपने ही आंगन से गुलदार का शिकार हो जाए, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के दावों और जमीन की हकीकत के बीच आखिर इतनी बड़ी दूरी क्यों है?

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