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पैराशूट प्रत्याशियों का खेल: जमीनी कार्यकर्ताओं के सम्मान पर “ऊंची उड़ान” का साया।

दर्पण न्यूज 24*7 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।

राजनीति में एक कड़वा सच हमेशा से मौजूद रहा है—जिस कार्यकर्ता ने जीवन भर पार्टी की सेवा की, संघर्ष किया, घर-परिवार से ज्यादा पार्टी को समय दिया, वही सम्मान का वास्तविक हकदार जब बनता है, तब उसके हिस्से में अक्सर निराशा ही आती है।
कारण?
क्योंकि चुनावी मौसम शुरू होते ही कुछ विशेष नेताओं के वंशज अचानक आसमान से उतरते हैं और पार्टी टिकट पर कब्जा जमा लेते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक शब्दावली में इन्हें “पैराशूट प्रत्याशी” कहा जाता है।
जमीनी कार्यकर्ता बनाम पैराशूट उम्मीदवार — संघर्ष और सत्य
एक तरफ वह कार्यकर्ता होता है जिसने वर्षों तक बूथ स्तर पर पार्टी की नींव को मजबूत किया, जनता के सुख-दुख में साथ रहा, संगठनात्मक ढांचे को खड़ा किया।
दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जो चुनाव के समय सिर्फ चेहरे पर चमक, हाथ में रसूख और पीछे बड़े नेताओं के आशीर्वाद के बल पर मैदान में उतर आते हैं।
दुखद यह है कि
जमीनी कार्यकर्ता की मेहनत का श्रेय अक्सर सत्ता और शक्ति से लबरेज इन “उतरे हुए” उम्मीदवारों को मिल जाता है।
उत्तराखंड विधानसभा में भी उठा मुद्दा
उत्तराखंड विधानसभा सत्र में भी इस गंभीर प्रकरण पर जोरदार बहस हो चुकी है।
विपक्ष ने सवाल उठाए, सत्ता पक्ष को जवाब देना पड़ा, लेकिन नतीजा?
जिन्हें फर्क पड़ना चाहिए था—वे बेफिक्र ही नजर आए।
कारण साफ है—
अपने राजनैतिक आकाओं और वंशानुगत ताकत के दम पर इन पैराशूट प्रत्याशियों के लिए टिकट कोई चुनौती नहीं, बल्कि पहले से तैयार “लैंडिंग पैड” बन चुका है।
पैराशूट संस्कृति के खतरें
पार्टी संगठन की वर्षों की मेहनत कमजोर होती है
वास्तविक कार्यकर्ता हताश होकर राजनीति से किनारा कर लेते हैं
जनता और जनसंघर्षों से दूर रहने वाले लोग जनता का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं
राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद और भी मजबूत होता है
क्या लोकतंत्र ऐसे ही चलेगा?
लोकतंत्र की बुनियाद समर्पित कार्यकर्ताओं और जनता के विश्वास पर टिकी है।
अगर यही कार्यकर्ता लगातार हाशिये पर धकेले जाते रहे, तो
न सिर्फ पार्टी कमजोर होगी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ें भी हिलेंगी।
अंत में…
पैराशूट उम्मीदवारों की उड़ान भले ही ऊंची हो,
लेकिन जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की ताकत ही राजनीति की असली रीढ़ है।
जिन पार्टियों ने इस सत्य को समझा, वे फली-फूलीं;
और जिन्होंने अनदेखा किया, वे इतिहास के पन्नों में धुंधली हो गईं।
अब वक्त है कि
पार्टी संगठन अपने असली सिपाहियों को पहचानें और राजनीति में मेरिट को “वंश” पर भारी बनने दें।

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