दर्पण न्यूज़ 24×7 — विशेष रिपोर्ट
संवाददाता : प्रमोद बमेटा
🚨 हल्द्वानी-अल्मोड़ा हाइवे पर दिल दहला देने वाला हादसा—देवभूमि की बदहाल सड़कों ने तीन शिक्षकों की जिंदगी निगल ली
सरकार की लापरवाही ने फिर ली तीन घरों की खुशियां… क्या अब भी जागेगा सिस्टम?
हल्द्वानी। शनिवार शाम 7 बजे, हल्द्वानी-अल्मोड़ा हाइवे पर रातीघाट के पास एक ऐसा भीषण हादसा हुआ जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया।
अल्मोड़ा से हल्द्वानी एक शादी समारोह में शामिल होने आ रहे चार शिक्षकों की कार अचानक अनियंत्रित हो गई और गहरी खाई में गिरते हुए सीधा शिप्रा नदी में जा समाई।
कार के गिरने की चीख को सुनते ही आसपास के ग्रामीणों का दिल बैठ गया। कुछ ही पलों में टॉर्च लिए लोग घटनास्थल पर पहुंचे—और सामने था एक दिल दहला देने वाला मंजर।
देवभूमि की खामोश पहाड़ियों में सड़क सुरक्षा की सीमाएं चीरती वह दुर्घटना सबको मूक कर गई।
🚑 एसडीआरएफ-पुलिस का रेस्क्यू, लेकिन नहीं बच सकी तीन शिक्षकों की जान
सूचना मिलते ही खैरना पुलिस और एसडीआरएफ मौके पर पहुंची। अंधेरे में रस्सियों के सहारे जवान खाई में उतरे।
कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी… भीतर चारों शिक्षक फंसे पड़े थे।
रेस्क्यू कर उन्हें खैरना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, मगर डॉक्टरों ने
सुरेंद्र भंडारी,
पुष्कर भैसोड़ा,
संजय बिष्ट
को मृत घोषित कर दिया।
तीनों शिक्षा जगत के सम्मानित चेहरे, कई विद्यार्थियों के भविष्य आकार देने वाले मार्गदर्शक… आज सिस्टम की लापरवाह सड़कों के शिकार बन गए।
दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल मनोज कुमार को प्राथमिक उपचार के बाद हल्द्वानी के हायर सेंटर रेफर किया गया है।
एसपी सिटी डॉ. जगदीश चंद्र ने हादसे की पुष्टि की और बताया कि रेस्क्यू में कोई कमी नहीं छोड़ी गई। पर सड़क की खामियों और रात की धुंध ने त्रासदी को रोकने नहीं दिया।
💔 तीन शिक्षकों का जाना—एक अपूरणीय क्षति
हादसे में जान गंवाने वाले तीनों शिक्षक केवल नाम नहीं थे—
वे उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था की मजबूत कड़ियां थे।
🔹 पुष्कर सिंह भैसोड़ा – एजुकेशनल मिनिस्टीरियल ऑफिसर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष
🔹 संजय बिष्ट – राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ, हवालबाग ब्लॉक के पदाधिकारी
🔹 सुरेंद्र भंडारी – वरिष्ठ शिक्षक एवं शिक्षा आंदोलन में सक्रिय व्यक्तित्व
इनके जाने से शिक्षक समाज ही नहीं, पूरा राज्य स्तब्ध है।
⚠️ सवाल सरकार से—क्या पहाड़ की जिंदगी इतनी सस्ती है?
रातीघाट का यह मोड़ कोई नया “दुर्घटना स्थल” नहीं है।
स्थानीय लोग लगातार चेताते रहे हैं—
🔸 कमजोर क्रैश बैरियर
🔸 टूटे किनारे
🔸 फिसलन भरी चढ़ाई
🔸 चेतावनी बोर्डों का अभाव
🔸 और सिर्फ कागज़ों में मौजूद “सुरक्षा उपाय”
पर हर बार की तरह, सिस्टम ने खतरे को अनदेखा किया…
और तीन और बेटे, तीन पिता, तीन शिक्षक इस लापरवाही की बलि चढ़ गए।
क्या इंतज़ार है सरकार को?
किसी मंत्री की कार इसी खाई में गिरे तब सुधरेंगी सड़कें?
🛑 देवभूमि की सड़कों की सच्चाई—विकास नहीं, लापरवाही की पटकथा
यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि यह बताता है कि—
पहाड़ में विकास के नाम पर बजट तो बनता है… लेकिन सड़कें अब भी जानलेवा हैं।
एक-एक मोड़ मौत का जाल बन चुका है।
सालों से अधर में लटकी परियोजनाएं,
ठेकेदारों की मनमानी,
और प्रशासन की खामोशी—
इनका खामियाजा हर साल दर्जनों परिवार भुगतते हैं।
🙏 सरकार के लिए यह चेतावनी है—नहीं तो कल फिर उठेगी एक और चिता
तीन शिक्षकों के घरों में मातम पसरा है।
उनके बच्चे, परिजन, सहकर्मी—सबका एक ही सवाल है:
हादसा रोका क्यों नहीं गया?
अब भी समय है—
रातीघाट जैसे संवेदनशील मोड़ों पर तत्काल सुरक्षा घेरा मजबूत किया जाए,
डामर और सड़क मरम्मत की वास्तविक जांच हो,
पहाड़ी मार्गों पर रात्रिकालीन सुरक्षा को प्राथमिकता मिले।
तीन शिक्षकों की ये बलि व्यर्थ न जाए— यही इस रिपोर्ट का उद्देश्य है।
✍️ विशेष रिपोर्ट : प्रमोद बमेटा
दर्पण न्यूज़ 24×7
“सच दिखाने से कभी पीछे नहीं हटेंगे…”
