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देवभूमि में वन्यजीवों का बढ़ता आतंक: वन विभाग और सरकार की उदासीनता से पौड़ी जनपद में गई दो जानें, ग्रामीणों में जबरदस्त आक्रोश।

पौड़ी। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में बाघ और गुलदार के हमलों ने जनजीवन को भयभीत कर दिया है, जबकि वन विभाग और सरकार की लापरवाही का खामियाज़ा लगातार ग्रामीणों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है। बीते 24 घंटों के भीतर जिले में वन्यजीवों के दो अलग-अलग हमलों में दो लोगों की मौत हो गई, जिससे क्षेत्र में रोष और दहशत दोनों चरम पर हैं।

शुक्रवार शाम जयहरीखाल ब्लॉक के सीरोबाड़ी गांव में घात लगाए बैठे बाघ ने 61 वर्षीय उर्मिला देवी को उस समय मार डाला, जब वह खेतों के पास चारापत्ती लेने गई थीं। देर शाम तक जब वह घर नहीं लौटीं, तो ग्रामीणों ने खोजबीन शुरू की और कुछ ही दूरी पर उनका क्षत-विक्षत शव मिला। घटना के बाद ग्रामीणों में इतना आक्रोश था कि उन्होंने वन विभाग के विरोध में शव उठाने से साफ इंकार कर दिया।

सूचना मिलते ही लैंसडौन विधायक दिलीप रावत और वन विभाग के अधिकारी मौके के लिए रवाना हुए, परंतु आक्रोशित ग्रामीणों ने विभाग की लगातार लापरवाही पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए समाधान की मांग की। ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में लगातार बढ़ रहे बाघ और गुलदार के खतरों के बावजूद विभाग कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा, जिससे आम जनता असुरक्षित महसूस कर रही है।

इस घटना से सिर्फ एक दिन पहले गुरुवार सुबह ग्रामसभा चवथ के गजल्ड गांव में गुलदार ने 42 वर्षीय राजेंद्र प्रसाद नौटियाल को मंदिर से लौटते समय मार डाला था। उस हादसे के बाद भी ग्रामीणों ने विधायक और जिलाधिकारी का घेराव कर अपना गुस्सा जताया था। स्थिति की गंभीरता देखते हुए शिक्षा विभाग को आसपास के 48 स्कूलों और सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में शनिवार तक की छुट्टी घोषित करनी पड़ी थी।

लगातार हो रही मौतों ने साबित कर दिया है कि पौड़ी जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है, जबकि सुरक्षा के इंतजाम नदारद हैं। ग्रामीणों की मांग है कि हमलावर वन्यजीवों को पकड़ने के लिए तत्काल पिंजरे लगाए जाएं, गश्त बढ़ाई जाए और जंगल किनारे सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएं।

लोगों का कहना है कि अगर विभाग समय रहते सक्रिय होता, तो शायद ये जानें बच सकती थीं। अब ग्रामीणों की उम्मीद शासन-प्रशासन से है कि वह इस गंभीर स्थिति को समझकर ठोस और स्थायी समाधान की दिशा में तुरंत कदम उठाए, ताकि मासूम लोगों की जानें यूं ही वन्यजीवों के हमलों में न जाती रहें।

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