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मोबाइल की लत ने छीनी मासूम जिंदगियाँ, ऑनलाइन गेम बनते जा रहे बच्चों के लिए जानलेवा!
साभार वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला |

दर्पण न्यूज 24/7
नई दिल्ली/गाजियाबाद/भोपाल। देश में ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती लत अब बच्चों और किशोरों के लिए जानलेवा साबित होने लगी है। हाल के दिनों में गाजियाबाद और भोपाल से सामने आई दो हृदयविदारक घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। यह घटनाएं बताती हैं कि किस तरह मोबाइल और ऑनलाइन गेम धीरे-धीरे बच्चों की दुनिया पर कब्जा कर रहे हैं और उन्हें अवसाद, हिंसा और आत्मघाती कदमों की ओर धकेल रहे हैं।
गाजियाबाद के टोला मोड़ क्षेत्र में एक अपार्टमेंट की नौवीं मंजिल से कूदकर तीन नाबालिग बहनों ने आत्महत्या कर ली। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि तीनों बहनें लंबे समय से एक कोरियन ऑनलाइन गेम की लत में फंसी हुई थीं। शुरुआत में यह शौक और मनोरंजन था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनकी जिंदगी का केंद्र बन गया। पढ़ाई छूट गई और स्कूल जाना भी बंद हो गया। वे वास्तविक दुनिया से कटती चली गईं और कोरियाई संस्कृति से इतनी प्रभावित हो गईं कि अपने नाम तक बदल लिए थे।
जानकारी के अनुसार बड़ी बहन गेम में ‘डेथ कमांडर’ की भूमिका निभाती थी और छोटी बहनों को टास्क देती थी। पिता ने जब दो सप्ताह पहले मोबाइल छीनकर बेच देने की बात कही तो तीनों बेटियां गहरे अवसाद में चली गईं। उसी रात उन्होंने आत्मघाती कदम उठा लिया। माता-पिता द्वारा लत छुड़ाने के प्रयास नाकाम साबित हुए और शौक कब नशा बन गया, इसका उन्हें पता ही नहीं चला।
दूसरी घटना भोपाल के श्रीराम कॉलोनी छत्रसाल नगर की है, जहां 14 वर्षीय छात्र ने घर में फांसी लगाकर जान दे दी। बताया गया कि छात्र मोबाइल पर ‘फ्री फायर’ गेम का आदी था। परिजनों द्वारा मोबाइल छीन लिए जाने के बाद वह तनाव और अवसाद में आ गया। घटना के समय घर में कोई नहीं था। माता-पिता स्कूल में शिक्षक हैं। कई बार समझाने के बावजूद वह गेम की लत नहीं छोड़ पाया और अंततः आत्मघाती कदम उठा लिया।
ऐसी घटनाएं पहली बार नहीं हुई हैं। इससे पहले ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ ने भारत सहित रूस और मध्य एशिया के देशों में कई किशोरों की जान ली थी। इस गेम में बच्चों को कई दिनों तक खतरनाक टास्क दिए जाते थे, जिनका अंत आत्महत्या जैसे कदमों से होता था। वर्ष 2018 में ‘मोमो चैलेंज’ व्हाट्सएप पर वायरल हुआ, जिसमें बच्चों को डराकर टास्क पूरे करवाए जाते थे। राजस्थान और उड़ीसा में इसके संदिग्ध मामले सामने आए थे, जिसके बाद पुलिस ने देशव्यापी एडवाइजरी जारी की।
इसके अलावा पबजी जैसे गेम आत्महत्या से सीधे जुड़े न होने के बावजूद बच्चों में हिंसक व्यवहार, चोरी और अवसाद को बढ़ावा दे रहे हैं। वर्ष 2020 में भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों से इस पर प्रतिबंध लगाया था। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में गेम खेलने से रोकने पर एक किशोर द्वारा मां की हत्या जैसी घटनाएं इस लत की भयावहता को उजागर करती हैं। इसी तरह ‘ब्लैकआउट चैलेंज’ जैसे ट्रेंड में बच्चों को सांस रोकने के लिए उकसाया गया, जिससे पश्चिमी देशों में कई मौतें हुईं।
ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया के बढ़ते दुष्प्रभावों को देखते हुए दुनिया के कई देशों ने कड़े कदम उठाए हैं। फ्रांस में 2018 से स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध है। ब्रिटेन ने जनवरी 2026 से स्कूलों में पूरे दिन मोबाइल पर रोक लागू कर दी है। ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया है। सिंगापुर और दक्षिण कोरिया ने भी स्कूलों में स्मार्ट डिवाइस के उपयोग पर सख्ती करने की घोषणा की है। यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत शिक्षा प्रणालियों में स्कूलों में स्मार्टफोन पर प्रतिबंध लागू किया जा चुका है।
इसके विपरीत भारत में इस दिशा में अभी तक कोई ठोस राष्ट्रीय नीति नहीं बन पाई है। एम्स दिल्ली के मनोरोग विभाग के डॉक्टर राजेश सागर के अनुसार ऑनलाइन गेम और अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। बच्चों के व्यवहार में आक्रामकता, चिड़चिड़ापन और अवसाद बढ़ रहा है। जानलेवा टास्क वाले गेम किशोरों की जान के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते अभिभावक, स्कूल और सरकार मिलकर ठोस कदम नहीं उठाते, तो आने वाले समय में यह संकट और गहराता जाएगा।

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