स्वर्णिम प्रभात का आगाज है महाशिवरात्रि: आचार्य प्रकाश बहुगुणा!
दर्पण न्यूज 24/7 हल्द्वानी/लालकुआँ।
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अज्ञानता के अंधकार से निकलकर ज्ञान, सदाचार और आत्मशुद्धि की ओर बढ़ने का संदेश है। आचार्य प्रकाश बहुगुणा ने कहा कि देवों के देव महादेव परमात्मा शिव का यह पर्व आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। शिवरात्रि अज्ञानरूपी रात्रि के अंत और स्वर्णिम प्रभात के आरंभ का सूचक है।
आचार्य प्रकाश बहुगुणा ने कहा कि जब समाज में अधर्म, हिंसा, अन्याय और भ्रष्टाचार बढ़ जाता है, तब परमात्मा शिव का दिव्य अवतरण होता है। आज विश्व जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें नैतिक पतन, सामाजिक असंतुलन और प्रकृति का असंतुलन स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा और युद्ध की आशंकाएं मानवता के लिए चेतावनी हैं कि अब आत्मिक परिवर्तन का समय आ गया है।
उन्होंने बताया कि महाशिवरात्रि भारतीय पंचांग के अंतिम माह में आती है। इसके बाद बसंत ऋतु का आगमन होता है, जब प्रकृति नवजीवन का संदेश देती है। जैसे पेड़-पौधे पुरानी पत्तियाँ त्यागकर नई कोपलें धारण करते हैं, वैसे ही मानव जीवन को भी बुराइयों को छोड़कर सद्गुणों को अपनाना चाहिए। यही शिवरात्रि का वास्तविक संदेश है।
आचार्य बहुगुणा के अनुसार शिव निराकार और अशरीरी परमात्मा हैं, जिनकी यादगार शिवलिंग के रूप में पूजी जाती है। शिव पर आक और धतूरा चढ़ाने का भाव प्रतीकात्मक है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य अपने भीतर के विकार—काम, क्रोध, लोभ, अहंकार—को त्यागे। केवल बाहरी पूजा से नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन से ही जीवन में वास्तविक शांति आती है।
उन्होंने कहा कि शिवरात्रि का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक अर्थ है मन की बुरी वृत्तियों पर नियंत्रण। जागरण का अर्थ केवल रात भर जागना नहीं, बल्कि आत्मा का जागरण है। जब मनुष्य स्वयं को आत्मा समझकर परमात्मा शिव से जोड़ता है, तभी सच्चा जागरण होता है।
आचार्य प्रकाश बहुगुणा ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर वे अपने भीतर की बुराइयों को त्यागकर दैवी गुणों को धारण करें और समाज में सद्भाव, शांति और नैतिकता की स्थापना में सहभागी बनें। यही शिवरात्रि का सार और संदेश है।
