दर्पण न्यूज ब्यूरो | प्रमोद बमेटा
उत्तराखंड में दलबदल का खेल: विचारधारा नहीं, ‘मलाई’ बनी सियासत का नया धर्म!
देहरादून।
उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां सिद्धांत और विचारधारा पीछे छूटते नजर आ रहे हैं, और ‘सत्ता’ व ‘सुविधा’ ही नेताओं की प्राथमिकता बनती जा रही है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस पार्टी के बीच चल रहा दलबदल का यह खेल अब खुलकर सामने आ चुका है।
राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार में ऐसे कई मंत्री शामिल हैं, जिनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से जुड़ी रही है। कभी कांग्रेस की विचारधारा का झंडा उठाने वाले ये नेता आज भाजपा सरकार में अहम पदों पर बैठकर सत्ता का लाभ उठा रहे हैं। वहीं, भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता—जिन्होंने वर्षों तक संघर्ष कर पार्टी को मजबूत किया—खुद को उपेक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
संघर्ष करने वाले किनारे, ‘आयातित’ नेताओं की चांदी!
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह स्थिति सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस भी अब उसी राह पर चलती दिख रही है। भाजपा में उपेक्षित या असंतुष्ट नेताओं को कांग्रेस खुले दिल से अपना रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह वैचारिक विस्तार है या केवल सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की रणनीति?
जमीनी स्तर पर काम करने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी असंतोष पनप रहा है। उनका मानना है कि यदि भविष्य में कांग्रेस सत्ता में आती है, तो संगठन के लिए वर्षों तक मेहनत करने वालों को नहीं, बल्कि हाल ही में शामिल हुए ‘भाजपाई चेहरों’ को ही मलाई मिलेगी।
जनता के मुद्दे पीछे, सत्ता का गणित आगे!
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक मूल्यों और जनता के भरोसे को हो रहा है। जनता यह समझने में असमर्थ है कि जो नेता कल तक एक पार्टी की नीतियों की आलोचना करते थे, आज उसी पार्टी में शामिल होकर उन्हीं नीतियों का समर्थन कैसे कर रहे हैं।
राजनीति के जानकार इसे “विचारधारा का क्षरण” मानते हैं, जहां अब न तो दलों के बीच स्पष्ट वैचारिक अंतर रह गया है और न ही नेताओं की प्रतिबद्धता स्थायी दिखती है।
क्या उत्तराखंड के हित में है यह राजनीति?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह दलबदल का खेल वास्तव में उत्तराखंड के हित में है?
या फिर यह केवल कुछ नेताओं के राजनीतिक भविष्य और व्यक्तिगत लाभ का जरिया बनकर रह गया है?
जब तक राजनीतिक दल अपने मूल कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने के बजाय ‘तुरंत लाभ’ की राजनीति करते रहेंगे, तब तक जमीनी स्तर पर असंतोष बढ़ना तय है।
उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल अब अपवाद नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति बन चुका है। लेकिन यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले समय में न केवल दलों की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे, बल्कि लोकतंत्र की जड़ें भी कमजोर हो सकती हैं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि राजनीतिक दल जमीनी कार्यकर्ताओं के विश्वास को कैसे बहाल करते हैं—या फिर ‘मलाई की राजनीति’ ही आगे का रास्ता तय करेगी।
