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जिला योजनांतर्गत स्वीकृत योजनाओं को पलीता, गंगापुर कबडवाल ग्रामसभा का मामला चर्चाओं में।
1100 मीटर चैन लिंक फेंसिंग तीन साल बाद भी अधूरी, विभाग ने 21 अगस्त को प्रधान को तीन दिन में काम पूरा करने का दिया अल्टीमेटम। निगरानी और जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल।

हल्दूचौड़। सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और किसानों की फसलों को जंगली व आवारा पशुओं से बचाने के लिए जिला योजना के माध्यम से करोड़ों रुपये की योजनाएं स्वीकृत करती है, लेकिन धरातल पर इन योजनाओं का क्या हश्र हो रहा है, इसकी बानगी गंगापुर कबडवाल ग्रामसभा में सामने आए 1100 मीटर चैन लिंक फेंसिंग के मामले से देखी जा सकती है। वर्ष 2023-24 में स्वीकृत योजना पर सामग्री उपलब्ध कराए जाने के बावजूद वर्षों बाद भी काम पूरा नहीं हो सका। अब कृषि एवं भूमि संरक्षण विभाग ने ग्राम प्रधान को पत्र जारी कर तीन दिन के भीतर कार्य पूरा कराने के निर्देश दिए हैं।
कृषि एवं भूमि संरक्षण अधिकारी, हल्द्वानी की ओर से 21 अगस्त 2026 को जारी पत्र में ग्राम प्रधान ललित सनवाल को स्पष्ट रूप से अवगत कराया गया है कि ग्राम पंचायत गंगापुर कबडवाल में जंगली एवं आवारा पशुओं से फसल सुरक्षा के लिए वर्ष 2023-24 में 1100 मीटर चैन लिंक फेंसिंग का कार्य स्वीकृत किया गया था। विभाग के अनुसार फेंसिंग के लिए चैन लिंक और एंगिल आयरन भी समय पर उपलब्ध करा दिए गए थे। इसके बावजूद कार्य अब तक पूर्ण नहीं कराया गया।
विभागीय पत्र की भाषा भी इस पूरे मामले में जिम्मेदार तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। पत्र में कहा गया है कि पूर्व में कई बार दूरभाष और पत्राचार के माध्यम से ग्राम प्रधान से कार्य पूरा करने का आग्रह किया गया, लेकिन इसके बावजूद कार्य पूरा नहीं हुआ। विभाग ने यह भी उल्लेख किया है कि प्रधान की ओर से जून माह में दिए गए दिनांक रहित पत्र में 31 जुलाई तक काम पूरा करने की बात कही गई थी, लेकिन निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी रही।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब यह योजना वर्ष 2023-24 में स्वीकृत हुई थी, सामग्री समय पर उपलब्ध करा दी गई थी और विभाग को बार-बार कार्य पूरा न होने की जानकारी थी तो तीन साल तक जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या विभागीय अधिकारी केवल दूरभाष और पत्राचार के जरिए सरकारी योजनाओं की निगरानी करते रहेंगे या धरातल पर जाकर काम की वास्तविक स्थिति भी देखेंगे?
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब विभाग स्वयं पत्र में लिख रहा है कि इस कार्य की समीक्षा जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी स्तर पर समय-समय पर होती है। यदि जिला योजना के कार्यों की नियमित समीक्षा होती है तो फिर 1100 मीटर की फेंसिंग वर्षों तक अधूरी कैसे रही? समीक्षा बैठकों में इस योजना की वास्तविक प्रगति दर्ज हुई या केवल कागजी प्रगति पर भरोसा किया गया, यह जांच का विषय है।
इस पूरे प्रकरण को सामने लाने में समाजसेवी हेम सनवाल की जागरूकता भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि यदि उन्होंने इस मामले को लेकर आवाज नहीं उठाई होती तो शायद योजना की यह स्थिति सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनती। सवाल यह भी है कि ग्रामसभा के सभी नागरिकों के समान अधिकार वाली विकास योजनाओं की जानकारी ग्रामीणों तक पारदर्शी तरीके से क्यों नहीं पहुंची?
सरकारी योजना किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं होती। जिला योजना के तहत स्वीकृत धन और उपलब्ध कराई गई सामग्री जनता के हित के लिए होती है। ऐसे में योजना की जानकारी सार्वजनिक करना, कार्यस्थल पर विवरण प्रदर्शित करना, उपलब्ध कराई गई सामग्री का हिसाब रखना और कार्य की प्रगति की नियमित निगरानी करना संबंधित तंत्र की जिम्मेदारी है। यदि इन बुनियादी प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ तो यह केवल ग्राम पंचायत की कार्यशैली पर सवाल नहीं, बल्कि निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
यहां एक और सवाल बेहद अहम है कि विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई चैन लिंक फेंसिंग और एंगिल आयरन का मौके पर कितना उपयोग हुआ और शेष सामग्री वर्तमान में कहां है? यदि कार्य अधूरा है तो उपलब्ध सामग्री का भौतिक सत्यापन कब हुआ? क्या विभाग ने मौके का निरीक्षण किया? यदि निरीक्षण हुआ तो उसकी रिपोर्ट क्या कहती है? और यदि निरीक्षण नहीं हुआ तो वर्षों से योजना की निगरानी किस आधार पर की जाती रही?
21 अगस्त को जारी पत्र में विभाग ने तीन दिन के भीतर काम पूरा करने का निर्देश तो दे दिया, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू होगी। यदि तीन दिन की समयसीमा में भी काम पूरा नहीं होता है तो क्या जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई होगी, क्या उपलब्ध कराई गई सामग्री का हिसाब लिया जाएगा और क्या पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी? इन सवालों का जवाब फिलहाल विभाग की ओर से सामने नहीं आया है।
गंगापुर कबडवाल का यह मामला अब महज 1100 मीटर फेंसिंग तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल बन गया है कि जिला योजनाओं के नाम पर स्वीकृत कार्यों की निगरानी वास्तव में कितनी गंभीरता से होती है। सरकार योजनाओं के लिए बजट जारी करती है, विभाग सामग्री उपलब्ध कराता है, अधिकारी समीक्षा करते हैं, लेकिन यदि वर्षों बाद भी काम अधूरा रहता है तो आखिर जवाबदेही किसकी है?
ग्रामीणों की मांग है कि मामले में केवल अधूरे कार्य को पूरा कराने तक कार्रवाई सीमित न रहे, बल्कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए। योजना की स्वीकृति से लेकर सामग्री उपलब्ध कराने, कार्य की प्रगति, निरीक्षण और अब तक की कार्रवाई तक सभी बिंदुओं की जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि योजना में कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी सामग्री उपलब्ध कराई गई और धरातल पर उसका कितना उपयोग हुआ।
जिला योजना की योजनाएं गांवों के विकास और ग्रामीणों की जरूरतों को पूरा करने के लिए होती हैं। यदि ऐसी योजनाएं वर्षों तक अधूरी पड़ी रहें और जिम्मेदारी तय करने में भी लंबा समय लग जाए तो यह व्यवस्था की गंभीर कमजोरी है। गंगापुर कबडवाल का मामला अब विभागीय पत्र से निकलकर जवाबदेही का सवाल बन चुका है। देखना यह है कि तीन दिन के अल्टीमेटम के बाद विभाग केवल फेंसिंग पूरी करवाता है या वर्षों से लटके इस पूरे मामले की जिम्मेदारी भी तय करता है।