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धामी ज्यू, ऐसिकै कसिक मिलेली 2027 में सत्ता?

जहाँ भाजपा तीसरी बार सत्ता में आने का सपना देख रही, वहीं प्रदेश में दूषित पानी से जूझ रहे लोग नैनीताल जिले में जल संस्थान की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल, स्वास्थ्य महकमा भी लाचार, निजी अस्पतालों के भरोसे इलाज की व्यवस्था!

हल्द्वानी/नैनीताल। उत्तराखंड में भाजपा वर्ष 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। संगठन चुनावी तैयारियों में जुटा है, बैठकों में रणनीतियां बन रही हैं और सरकार के विकास कार्यों को जनता तक पहुंचाने की कवायद चल रही है। लेकिन नैनीताल जिले के ज्योलीकोट और आसपास के गांवों से सामने आई दूषित पेयजल की तस्वीर इन दावों के बीच एक असहज सवाल खड़ा कर रही है—जब जनता को पीने के लिए साफ पानी तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा, तो विकास और सुशासन के दावों की असली कसौटी क्या है?

ज्योलीकोट क्षेत्र में दूषित पेयजल के कारण जलजनित बीमारियों का संकट गंभीर रूप ले चुका है। पीलिया, डायरिया, टाइफाइड और बुखार की शिकायतों के बीच कई परिवारों में एक साथ दो से तीन लोगों के बीमार होने की बात सामने आई है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र के आठ गांवों में 200 से अधिक लोग इन बीमारियों की चपेट में आए हैं। दो लोगों की मौत के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ, जबकि अन्य रिपोर्टों में मृतकों की संख्या तीन तक बताई गई है।

सवाल सिर्फ बीमारी का नहीं, पानी पहुंचाने वाली व्यवस्था का है

ग्रामीणों का आरोप है कि बारिश के बाद क्षतिग्रस्त सीवर लाइन और पेयजल पाइपलाइन के कारण दूषित पानी घरों तक पहुंचा। पानी की जांच में ई-कोलाई बैक्टीरिया की मौजूदगी ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक पहले जल संस्थान की ओर से कराई गई जांच में पानी को साफ बताया गया, जबकि बाद की जांच में ई-कोलाई का स्तर मानक से कई गुना अधिक पाया गया।

यहीं से जल संस्थान की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।

यदि पानी की गुणवत्ता को लेकर समय रहते शिकायतें सामने आ रही थीं तो पाइपलाइनों, टैंकों और क्लोरीनेशन व्यवस्था की नियमित निगरानी क्यों नहीं हुई? यदि पानी दूषित था तो वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था तत्काल क्यों नहीं की गई? और यदि सरकारी जांच में पानी सुरक्षित था तो उसी पानी के सेवन के बाद इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमार कैसे पड़ गए?

इन सवालों का जवाब अब सिर्फ ज्योलीकोट के ग्रामीण नहीं, बल्कि पूरा क्षेत्र मांग रहा है।

बीमारी बढ़ी तो अस्पतालों में बढ़ी भीड़, निजी अस्पतालों पर बढ़ा बोझ

दूषित पानी से फैली बीमारी का असर ज्योलीकोट के साथ आसपास के गांवों तक पहुंचा है। बेलुवाखान, गेठिया, सरियाताल, दुर्गापुर, गांजा, वीरभट्टी और खुर्पाताल समेत आसपास के क्षेत्रों में भी बीमारी की शिकायतें सामने आई हैं।

मरीजों के अस्पताल पहुंचने का सिलसिला बढ़ने के साथ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा है। गंभीर मरीजों को हल्द्वानी रेफर करना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर पर्याप्त उपचार और जांच की सुविधा नहीं मिलने के कारण कई परिवारों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।

यहीं स्वास्थ्य महकमे की तैयारियों पर भी सवाल उठ रहे हैं। बीमारी फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने घर-घर सर्वे, स्वास्थ्य शिविर, दवाओं के वितरण और मरीजों की जांच शुरू की, लेकिन सवाल यह है कि जब एक साथ बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ रहे हों तो क्या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के पास उन्हें तत्काल समुचित उपचार उपलब्ध कराने के पर्याप्त संसाधन हैं?

सरकारी अस्पताल सीमित, निजी अस्पताल मजबूरी

ज्योलीकोट और आसपास के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बीमारी की मार सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। सरकारी अस्पतालों की सीमित सुविधाओं के बीच गंभीर मरीजों को हल्द्वानी के अस्पतालों तक ले जाना पड़ रहा है। कई मामलों में निजी अस्पतालों का सहारा लेना परिवारों की मजबूरी बन रहा है।

निजी अस्पतालों में जांच, दवाइयों और भर्ती का खर्च गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अलग आर्थिक संकट खड़ा कर रहा है। यानी एक तरफ दूषित पानी ने बीमारी दी, दूसरी तरफ इलाज का खर्च परिवारों की कमर तोड़ रहा है।

ऐसे में सवाल यह भी है कि यदि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त रूप से मजबूत होती तो क्या लोगों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों की ओर भागना पड़ता?

दो मौतों के बाद प्रशासन हरकत में आया

ज्योलीकोट क्षेत्र में मौतों के बाद प्रशासन ने स्थलीय निरीक्षण किया। अधिकारियों के सामने ग्रामीणों ने पेयजल व्यवस्था और जल संस्थान की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी जताई। ग्रामीणों का कहना था कि समस्या की जानकारी पहले से दी जा रही थी, लेकिन समय रहते इसे गंभीरता से नहीं लिया गया।

वहीं हाईकोर्ट ने भी मामले में सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पानी की जांच निजी प्रयोगशाला से कराने और राहत कार्यों की निगरानी को लेकर जिलाधिकारी को निर्देश दिए हैं। इससे स्पष्ट है कि मामला अब महज स्थानीय शिकायत नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

स्वास्थ्य विभाग जुटा, लेकिन मूल सवाल जस का तस

स्वास्थ्य विभाग ने क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई है। घर-घर सर्वे, स्वास्थ्य शिविर, दवाओं का वितरण और मरीजों की जांच की जा रही है। लेकिन बीमारी फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता अपनी जगह है और बीमारी की जड़ यानी दूषित पेयजल व्यवस्था की जिम्मेदारी अपनी जगह।

मरीजों का इलाज जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह सुनिश्चित करना है कि लोगों के घरों तक दोबारा दूषित पानी न पहुंचे।

अगर जल संस्थान पाइपलाइन, टैंक, क्लोरीनेशन और जल गुणवत्ता की निगरानी में विफल रहता है और स्वास्थ्य विभाग बीमारी फैलने के बाद मरीजों को संभालने में ही उलझा रहता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर आम जनता के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी किसकी है?

2027 की राह में ज्योलीकोट भी परीक्षा

एक तरफ भाजपा 2027 में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। दूसरी तरफ जनता के बीच बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष के सवाल सामने आ रहे हैं।

ज्योलीकोट की घटना सरकार के लिए महज स्थानीय स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा भी है।

जनता को भाषण में विकास नहीं, नल खोलने पर साफ पानी चाहिए। अस्पतालों में सिर्फ दावे नहीं, जरूरत के समय डॉक्टर, जांच और दवाएं चाहिए। और बीमारी फैलने के बाद जांच नहीं, उससे पहले व्यवस्था की निगरानी चाहिए।

ज्योलीकोट की त्रासदी यही सवाल पूछ रही है कि यदि एक क्षेत्र में लोग दूषित पानी पीते रहे, परिवार बीमार होते रहे और मौतें होने लगीं, तो जिम्मेदारी आखिर तय किसकी होगी?

भाजपा अगर 2027 में तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है तो उसे ज्योलीकोट जैसे सवालों का जवाब भी जनता के बीच देना होगा। चुनावी रणनीति सरकार बनाने का रास्ता तय कर सकती है, लेकिन जनता का भरोसा रोजमर्रा की बुनियादी सुविधाओं से बनता है।

ज्योलीकोट में आज सबसे बड़ा सवाल यही है—सत्ता में वापसी का सपना अपनी जगह, लेकिन जनता को साफ पानी और समय पर इलाज कौन देगा?

और कुमाऊं की बोली में उठ रहा सवाल इससे भी सीधा है—

“धामी ज्यू, ऐसिकै कसिक मिलेली 2027 में सत्ता?”

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