








दूषित पानी से मौतों के बाद भी नहीं जागा सिस्टम!
300 से ज्यादा लोग बीमार होने का दावा, दो मौत के बाद सड़क पर उतरे ग्रामीण—जल संस्थान के खिलाफ फूटा आक्रोश!
ज्योलीकोट (नैनीताल)।
जिस पानी को जिंदगी की बुनियादी जरूरत माना जाता है, वही अगर बीमारी और मौत का कारण बनने लगे तो सवाल सिर्फ पानी की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि पूरे सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर उठता है। ज्योलीकोट और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में कथित दूषित पेयजल से दो लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने के बाद मंगलवार को ग्रामीणों का गुस्सा आखिरकार सड़क पर उतर आया।
ज्योलीकोट मुख्य बाजार में स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों ने धरना-प्रदर्शन कर जल संस्थान के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने दूषित पेयजल आपूर्ति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की।
ग्रामीणों के मुताबिक पिछले करीब एक माह से ज्योलीकोट समेत आसपास के गांवों में दूषित पेयजल की समस्या बनी हुई है। ज्योलीकोट, सरियाताल, गांजा, बेलुवाखान, वीरभट्टी छीना, बकरखोड़, देबुवाजाला और ढाकाखेत क्षेत्र में दूषित पानी के कारण पीलिया, टाइफाइड और लीवर संक्रमण जैसी बीमारियों से 300 से अधिक लोगों के प्रभावित होने का दावा किया जा रहा है।
बीमारी फैली तो सवाल भी उठे—आखिर जिम्मेदार कौन?
ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य संकट लगातार गंभीर होता गया और अब तक दो लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद पेयजल व्यवस्था को लेकर स्थायी समाधान न होने से लोगों में आक्रोश बढ़ता गया।
मंगलवार को युवा कार्तिकेय की पहल और स्थानीय युवाओं के नेतृत्व में ज्योलीकोट मुख्य बाजार में धरना शुरू किया गया। दर्जनों युवाओं के साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण धरने में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने जल संस्थान के खिलाफ नारेबाजी करते हुए दूषित जलापूर्ति तत्काल बंद कर क्षेत्र में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की।
‘शुद्ध पानी नहीं तो संघर्ष जारी रहेगा’
धरने को संबोधित करते हुए ब्लॉक प्रमुख हरीश बिष्ट ने कहा कि जब तक क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति पूरी तरह शुद्ध नहीं की जाती और प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा नहीं दिया जाता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिस समस्या ने अब स्वास्थ्य संकट का रूप ले लिया है, उसके समाधान में सरकारी तंत्र की गंभीरता सवालों के घेरे में है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते पेयजल स्रोतों, पाइपलाइनों और आपूर्ति व्यवस्था की प्रभावी जांच और निगरानी की गई होती तो हालात इतने गंभीर नहीं होते।
मौतों के बाद भी नहीं थम रहा सवाल—सरकारी दावे बनाम जमीन की हकीकत!
दूषित पेयजल से बीमारी और मौतों के आरोपों ने सरकारी पेयजल व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आखिर पेयजल की गुणवत्ता जांचने की जिम्मेदारी किसकी है? दूषित पानी लोगों के घरों तक कैसे पहुंचा? समय रहते इसकी रोकथाम क्यों नहीं हो सकी? और यदि शिकायतें पहले से सामने आ रही थीं तो कार्रवाई में देरी क्यों हुई?
ग्रामीण अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जवाबदेही और ठोस कार्रवाई चाहते हैं।
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द पेयजल व्यवस्था दुरुस्त कर शुद्ध जलापूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई, प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा नहीं मिला और पीड़ितों को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।
धरना-प्रदर्शन में जिला पंचायत उपाध्यक्ष एवं पूर्व ब्लॉक प्रमुख गीता बिष्ट, राज्य आंदोलनकारी हरीश पनेरू, भाजपा नेता हेम आर्या, क्षेत्र पंचायत सदस्य हिमांशु पांडे, ग्राम प्रधान नवल कुमार, मनोज बर्गली और जीवन चंद्र समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
जब पानी बीमारी का कारण बनने लगे और मौतों का दावा सामने आए, तब सरकारी सिस्टम की पहली जिम्मेदारी सिर्फ जांच का आदेश देना है या यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी घर तक दूषित पानी दोबारा न पहुंचे? ज्योलीकोट का आक्रोश इसी जवाब का इंतजार कर रहा है।
