








ज्योलीकोट में दो मौतों के बाद सवाल?जिम्मेदार कौन?
2018 में पेयजल योजना स्वीकृत, फिर भी धरातल पर नहीं पहुंची, दूषित पानी से स्वास्थ्य संकट पर यशपाल आर्य ने सरकार को घेरा,रूसी बाईपास की करोड़ों की एसटीपी परियोजना से पटवाडांगर की 80 एकड़ जमीन तक उठाए सवाल!
नैनीताल। ज्योलीकोट में दूषित पेयजल से पैदा हुआ स्वास्थ्य संकट अब महज बीमारी और पानी की समस्या नहीं रह गया है। दो लोगों की मौत और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने के बाद सवाल सीधे सरकार और प्रशासन की जवाबदेही तक पहुंच गया है। शुक्रवार को नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ज्योलीकोट पहुंचे और हालात का जायजा लेने के साथ ही दिवंगत लोगों के परिजनों से मुलाकात कर सांत्वना दी। इसके बाद उन्होंने सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
आर्य ने कहा कि दूषित पानी के सेवन से पीलिया और डायरिया जैसी बीमारियों की चपेट में लोग आ रहे हैं तथा कई मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ रहा है। ऐसे समय में भी स्थिति पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाना गंभीर चिंता का विषय है।
लेकिन आर्य का सबसे बड़ा सवाल बीमारी फैलने के बाद की व्यवस्था को लेकर ही नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को लेकर है जो वर्षों पहले तैयार हो जानी चाहिए थी।
2018 में योजना मंजूर थी तो आज दूषित पानी क्यों?
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि ज्योलीकोट क्षेत्र की पेयजल समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2018 में योजना स्वीकृत होने के साथ धनराशि का प्रावधान किया गया था। इसके बावजूद वर्षों बाद भी योजना धरातल पर शुरू नहीं हो सकी।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—जब समस्या पुरानी थी, योजना स्वीकृत थी और धनराशि का प्रावधान था तो काम क्यों नहीं हुआ?
आर्य ने आरोप लगाया कि यदि समय रहते योजना पर काम शुरू कर दिया जाता तो वर्तमान स्वास्थ्य संकट को काफी हद तक टाला जा सकता था। उन्होंने इस देरी को प्रशासनिक उदासीनता का गंभीर उदाहरण बताया।
दो मौतों के बाद अब यह सवाल और भी बड़ा हो गया है कि आखिर स्वीकृत योजना फाइलों में क्यों अटकी रही और वर्षों तक किसी ने इसकी सुध क्यों नहीं ली?
संकट आया तो टैंकर दौड़े, लेकिन स्थायी समाधान कब?
दूषित पानी की समस्या सामने आने के बाद प्रशासन की ओर से वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था की जा रही है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष ने स्पष्ट किया कि संकट का स्थायी समाधान केवल तत्काल राहत तक सीमित नहीं हो सकता।
उनका कहना है कि प्रभावित क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए तत्काल ठोस कदम उठाने की मांग की।
रूसी बाईपास की एसटीपी—करोड़ों की परियोजना बारिश में टूटी तो जिम्मेदार कौन?
ज्योलीकोट के बाद आर्य रूसी बाईपास पहुंचे। यहां जल निगम की ओर से करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की जा रही सीवर ट्रीटमेंट प्लांट परियोजना का भी जायजा लिया।
बताया गया कि पिछले वर्ष बारिश में एसटीपी परियोजना क्षतिग्रस्त हो गई, जिसके बाद करोड़ों रुपये की लागत वाली यह परियोजना अधर में लटकी हुई है।
आर्य ने परियोजना को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर सरकारी धन से तैयार हो रही परियोजनाएं इतनी कमजोर क्यों साबित हो रही हैं कि बारिश के दबाव में ही क्षतिग्रस्त हो जाएं?
निर्माण की गुणवत्ता, तकनीकी निगरानी, कार्यदायी संस्था की जवाबदेही और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर उन्होंने सरकार से जवाब मांगा।
एक तरफ पानी के लिए जूझता ज्योलीकोट, दूसरी तरफ 80 एकड़ जमीन की 90 साल की लीज
आर्य ने पटवाडांगर की करीब 80 एकड़ सरकारी भूमि को 90 वर्ष की लीज पर दिए जाने के मुद्दे पर भी कड़ा विरोध जताया।
उन्होंने कहा कि सरकारी जमीन को इतनी लंबी अवधि के लिए लीज पर दिए जाने के फैसले को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने इस मुद्दे को लेकर अगले सप्ताह पटवाडांगर में धरना-प्रदर्शन करने की घोषणा की।
यानी नेता प्रतिपक्ष ने एक ही दौरे में सरकार के सामने तीन अलग-अलग मोर्चे खोल दिए—ज्योलीकोट का पेयजल संकट, रूसी बाईपास की करोड़ों की एसटीपी परियोजना और पटवाडांगर की 80 एकड़ सरकारी जमीन।
अब विपक्ष पूछेगा—फाइलों से बाहर कब आएंगे जवाब?
आर्य ने कहा कि विपक्ष इस पूरे मामले में सरकार की जवाबदेही तय करेगा। आगामी विधानसभा सत्र में ज्योलीकोट की पेयजल योजना में हुई देरी, प्रशासनिक लापरवाही और मौजूदा स्वास्थ्य संकट को प्रमुखता से उठाया जाएगा।
ज्योलीकोट में दो मौतों के बाद अब मामला सिर्फ यह नहीं है कि आज साफ पानी कौन देगा? सवाल यह भी है कि आठ साल पहले स्वीकृत योजना आज तक क्यों नहीं बनी?
रूसी बाईपास में सवाल सिर्फ यह नहीं कि टूटी एसटीपी कब बनेगी, बल्कि यह भी है कि करोड़ों की परियोजना की गुणवत्ता और निगरानी के लिए जिम्मेदार कौन था?
और पटवाडांगर में सवाल सिर्फ जमीन की लीज का नहीं, बल्कि यह भी है कि 80 एकड़ सरकारी भूमि को 90 साल के लिए देने का फैसला किस आधार पर और किसके हित में लिया गया?
इन सवालों पर अब सरकार और संबंधित विभागों के जवाब का इंतजार रहेगा।
दर्पण न्यूज 24/7
