

ग्राफिक एरा ने हल्द्वानी से भरी अंतरिक्ष नवाचार की नई उड़ान!
‘आकाशयान स्पर्धा’ में विद्यार्थियों ने रॉकेट्री से लेकर 35 किलोमीटर ऊंचाई वाले हाई-एल्टीट्यूड बैलून मिशन मिशन तक दिखाया तकनीकी हुनर!
हल्द्वानी। अंतरिक्ष विज्ञान अब सिर्फ किताबों और प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा। हल्द्वानी में आयोजित ‘आकाशयान स्पर्धा–नेशनल रॉकेट्री चैलेंज’ में ग्राफिक एरा ने अपने विद्यार्थियों की तकनीकी प्रतिभा और एयरोस्पेस शिक्षा के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता को राष्ट्रीय मंच पर सामने रखा। इंदिरा गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में आयोजित इस दो दिवसीय आयोजन में ग्राफिक एरा के विद्यार्थियों ने रॉकेट्री से लेकर हाई-एल्टीट्यूड बैलून मिशन तक विभिन्न तकनीकी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।
ग्राफिक एरा ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस और एस्ट्रोवर्स एक्सपीरियंस प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से आयोजित इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में देशभर के 30 विश्वविद्यालयों और 35 स्कूलों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। लेकिन आयोजन की सबसे खास उपलब्धियों में ग्राफिक एरा के विद्यार्थियों की वह तकनीकी भागीदारी रही, जिसने कक्षा की पढ़ाई को वास्तविक एयरोस्पेस मिशन से जोड़ दिया।
35 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा ग्राफिक एरा से जुड़ा मिशन!
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण हाई-एल्टीट्यूड बैलून मिशन रहा। आयोजकों के अनुसार उत्तराखंड में इस प्रकार का यह पहला मिशन था। वैज्ञानिक पेलोड को लगभग 35 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए तैयार किए गए इस मिशन में विभिन्न ऊंचाइयों पर वायुमंडलीय आंकड़े एकत्र करने की व्यवस्था की गई थी।
तापमान, वायु घनत्व, वायुमंडलीय दबाव और विकिरण की निगरानी के लिए सेंसर लगाए गए। इसके अलावा एयरोसोल और अल्ट्रावायलेट विकिरण से संबंधित आंकड़े जुटाने के लिए भी तकनीकी प्रणालियां विकसित की गईं।
इस मिशन में ग्राफिक एरा (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), देहरादून के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग और ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, भीमताल के इंजीनियरिंग विद्यार्थियों ने तकनीकी योगदान दिया। विद्यार्थियों ने केवल कार्यक्रम में भागीदारी ही नहीं की, बल्कि मिशन और उससे जुड़ी प्रणालियों के विकास में भी भूमिका निभाई।
कक्षा से मिशन तक—विद्यार्थियों ने किया तकनीक का इस्तेमाल!
ग्राफिक एरा के लिए इस आयोजन की खासियत यही रही कि विद्यार्थियों को एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की अवधारणाओं को वास्तविक मिशन में लागू करने का अवसर मिला। रॉकेट डिजाइन, प्रोपल्शन, एयरोडायनामिक्स, फ्लाइट कंट्रोल और रिकवरी तकनीक जैसी अवधारणाओं का प्रयोगात्मक प्रदर्शन किया गया।
एच ए बी मिशन में इस्तेमाल किया गया ग्लाइडर आधारित रिकवरी मैकेनिज्म भी विद्यार्थियों के तकनीकी काम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इस प्रणाली को वैज्ञानिक पेलोड को लॉन्च साइट के आसपास निर्धारित लैंडिंग क्षेत्र की दिशा में वापस लाने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया था।
यानी विद्यार्थियों के सामने चुनौती केवल पेलोड को आसमान तक पहुंचाने की नहीं थी, बल्कि उसे नियंत्रित तरीके से वापस लाने की तकनीक विकसित करने की भी थी।
एयरोस्पेस शिक्षा को प्रयोग से जोड़ रहा ग्राफिक एरा!
कार्यक्रम में ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, भीमताल के निदेशक ने हल्द्वानी और कुमाऊं क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की अंतरिक्ष पहल लाने के लिए एस्ट्रोवर्स की सराहना की। उन्होंने एचएबी मिशन में ग्राफिक एरा के विद्यार्थियों की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हुए उनके तकनीकी योगदान की सराहना की।
उन्होंने प्रो. डॉ. सुधीर जोशी, विभागाध्यक्ष, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग तथा ग्राफिक एरा देहरादून और ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, भीमताल के विद्यार्थियों के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया।
ग्राफिक एरा के लिए यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इससे विद्यार्थियों को यह अनुभव मिला कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई का वास्तविक लक्ष्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि तकनीकी समस्याओं का समाधान विकसित करना और उन्हें वास्तविक परिस्थितियों में परखना भी है।
हल्द्वानी में दिखी ग्राफिक एरा की तकनीकी पहचान!
‘आकाशयान स्पर्धा’ ने हल्द्वानी को रॉकेट्री और एयरोस्पेस नवाचार के राष्ट्रीय मंच के रूप में सामने रखा। वहीं ग्राफिक एरा ने इस आयोजन में अपने विद्यार्थियों की तकनीकी क्षमता के जरिए यह संदेश दिया कि उत्तराखंड के संस्थान और विद्यार्थी भी अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में प्रयोग और नवाचार की अग्रिम पंक्ति में जगह बना सकते हैं।
कार्यक्रम में हल्द्वानी के मेयर गजराज बिष्ट, उत्तराखंड पर्यटन विभाग की अपर निदेशक पूनम चंद, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. भुवन भट्ट, एरीज नैनीताल के रजिस्ट्रार डॉ. मोहित कुमार जोशी तथा प्रो. डॉ. सुधीर जोशी सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे। उत्तराखंड पर्यटन, एरीज, यूकॉस्ट और समग्र शिक्षा विभाग भी इस पहल से जुड़े रहे।
हल्द्वानी के आसमान में उड़ान भरता यह मिशन सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं था। यह ग्राफिक एरा के उन विद्यार्थियों की प्रयोगशाला भी था, जिन्होंने किताबों में पढ़ी एयरोस्पेस तकनीक को वास्तविक मिशन में उतारकर दिखाया।
