

शहर की चकाचौंध में कहीं पीछे न छूट जाएं मां-बाप के सपने!
हैड़ाखान की वायरल तस्वीर ने किया सोचने पर मजबूर! क्या बदलती दुनिया के बच्चों को अपने पालनहार ही लगने लगे हैं पुराने जमाने के ?
दर्पण न्यूज 24/7 | प्रमोद बमेटा
हैड़ाखान रोड की वायरल तस्वीर सामने आई तो पहली नजर में लगा—युवाओं की एक लापरवाही है। चलती बुलेट की टंकी पर युवती बैठी है, पहाड़ की घुमावदार सड़क है और जरा सी चूक जिंदगी पर भारी पड़ सकती है।
लेकिन तस्वीर ने मन में एक और सवाल पैदा कर दिया।
क्या हमारी नई पीढ़ी इतनी तेज दौड़ने लगी है कि अब उन्हें पीछे खड़े मां-बाप की आवाज भी सुनाई नहीं देती?
यह सवाल बेटियों को लेकर ज्यादा बेचैन करता है। इसलिए नहीं कि बेटियां गलत हैं, बल्कि इसलिए कि जिन बेटियों को मां-बाप ने अपनी आंखों का तारा बनाकर पाला, वही जब पढ़ाई और रोजगार के लिए शहरों में पहुंचती हैं तो उनके सामने एक बिल्कुल नई दुनिया खुलती है।
शहर की रोशनी, आजादी, नए दोस्त, सोशल मीडिया, फैशन और अपनी पसंद से जिंदगी जीने का उत्साह—सब कुछ आकर्षित करता है।
और इसी बीच कभी-कभी मां की वह पुरानी सीख बोझ लगने लगती है।
पिता की चिंता दखल लगने लगती है।
घर की हिदायतें पिछड़ी सोच लगने लगती हैं।
और मां-बाप… वही मां-बाप, जिन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, अचानक पुराने जमाने के लगने लगते हैं।
मां-बाप शायद पुराने हों, उनकी चिंता नहीं
हो सकता है माता-पिता आधुनिक दुनिया को उतना न समझते हों। हो सकता है उन्हें सोशल मीडिया की भाषा, शहर की जीवनशैली या नई पीढ़ी के रिश्तों की बारीकियां मालूम न हों।
लेकिन एक बात वे जानते हैं—बच्चे की जिंदगी की कीमत।
मां की चिंता शायद इसलिए होती है कि बेटी देर रात घर नहीं पहुंची।
पिता बार-बार फोन शायद इसलिए करते हैं कि उन्हें रास्ते की चिंता होती है।
वे पूछते हैं—कहां हो, किसके साथ हो, कब लौटोगी?
बच्चों को कभी-कभी ये सवाल परेशान करते हैं।
लेकिन यही सवाल उस उम्र में उनकी सुरक्षा की चिंता से पैदा होते हैं।
मां-बाप हर बार सही हों, यह जरूरी नहीं। उनकी सोच भी समय के साथ बदलनी चाहिए। लेकिन उनकी नीयत को सिर्फ इसलिए खारिज कर देना कि वे ‘पुराने जमाने’ के हैं, शायद उचित नहीं।
बेटियों को रोकना नहीं, समझना जरूरी है
यह भी सच है कि हर बेटी शहर जाकर भटकती नहीं और हर आधुनिक जीवनशैली गलत नहीं होती। हजारों बेटियां छोटे कस्बों और पहाड़ों से निकलकर शहरों में पढ़ रही हैं, करियर बना रही हैं और परिवार का नाम रोशन कर रही हैं।
इसलिए सवाल बेटियों की आजादी पर पहरा लगाने का नहीं है।
सवाल यह है कि आजादी के साथ विवेक कैसे बचे?
उन्हें इतना सक्षम बनाया जाए कि चमक और वास्तविकता के बीच अंतर समझ सकें। सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी और असली जिंदगी का फर्क जान सकें। किसी दोस्ती, रिश्ते या फैसले में अपने सम्मान और सुरक्षा को सबसे ऊपर रख सकें।
और यह शिक्षा केवल बेटियों के लिए नहीं—बेटों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।
गलती पीढ़ी की नहीं, संवाद की दूरी की है
आज सबसे बड़ी समस्या शायद यह नहीं कि बच्चे बदल गए हैं।
समस्या यह है कि मां-बाप और बच्चों के बीच बातचीत का पुल कमजोर हो गया है।
बच्चे सोचते हैं—मां-बाप समझेंगे नहीं।
मां-बाप सोचते हैं—बच्चे हमारी सुनते नहीं।
फिर दोनों अपनी-अपनी दुनिया में चले जाते हैं।
यहीं से दूरी पैदा होती है।
जरूरत इस दूरी को कम करने की है। बच्चों को केवल आदेश नहीं, संवाद चाहिए। उन्हें डांट से ज्यादा विश्वास चाहिए। और माता-पिता को भी यह स्वीकार करना होगा कि नई पीढ़ी की दुनिया उनके समय से अलग है।
लेकिन बच्चों को भी यह याद रखना होगा कि नई दुनिया में जीने की क्षमता उन्हें पुरानी पीढ़ी ने ही दी है।
शहर की रोशनी में गांव का वह घर मत भूल जाना
जिस घर से बेटी शहर जाती है, वहां अक्सर मां देर रात तक जागती है।
फोन की घंटी बजती है तो दिल धड़क उठता है।
पिता बाहर से सामान्य दिखता है, लेकिन बेटी के फोन का इंतजार करता रहता है।
बेटी के लिए शहर शायद अवसरों की दुनिया है।
लेकिन घर के लिए वह अब भी वही बच्ची है, जिसकी चोट पर मां रातभर जागती थी।
इसलिए आधुनिक बनिए, आगे बढ़िए, अपने सपने पूरे कीजिए।
लेकिन इतना जरूर याद रखिए कि आपकी आजादी के पीछे किसी मां की दुआ और किसी पिता की मेहनत खड़ी है।
मां-बाप को पुराना समझने से पहले यह जरूर सोचिए कि जिन लोगों को आज आप पीछे छूटा हुआ मान रहे हैं, उन्होंने ही आपको आगे बढ़ने का रास्ता दिया है।
हैड़ाखान की वायरल तस्वीर शायद एक सड़क हादसे की आशंका भर हो।
लेकिन अगर वह तस्वीर हमें अपने बच्चों से संवाद करने, उनकी दुनिया समझने और उन्हें सुरक्षित फैसले लेने की सीख देने के लिए मजबूर कर दे, तो शायद उस घटना से एक बड़ा सामाजिक सबक लिया जा सकता है।
बच्चों को पंख जरूर दीजिए, लेकिन उड़ान से पहले आसमान की ऊंचाई समझना भी सिखाइए।
और बेटियों से खासकर इतना जरूर कहिए—
मां-बाप आपकी उड़ान के दुश्मन नहीं हैं।
वे बस चाहते हैं कि उड़ते हुए आप सुरक्षित रहें।
क्योंकि शहर की चकाचौंध चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो,
घर के दरवाजे पर इंतजार करती मां की आंखों से ज्यादा सच्ची रोशनी शायद ही कहीं मिले।
