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पीलिया से छात्रा की मौत के बाद जल संस्थान की कार्यप्रणाली पर सवाल!

तल्ली बमोरी में गंदे पानी की शिकायतों के बीच सुहानी की मौत, अब सवाल—शिकायतों पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो। हल्द्वानी।

नैनीताल के ज्योलिकोट में जलजनित बीमारियों को लेकर उठे सवालों के बीच हल्द्वानी के तल्ली बमोरी से सामने आई एक छात्रा की मौत ने शहर की पेयजल व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वार्ड नंबर-9 निवासी और एमबीपीजी कॉलेज में बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा सुहानी पंत की पीलिया की पुष्टि के बाद उपचार के दौरान मौत हो गई। हालत गंभीर होने पर उसे बरेली के राममूर्ति अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां करीब तीन दिन वेंटिलेटर पर रहने के बाद उसकी मौत हो गई।

सुहानी हल्द्वानी में अपनी बुआ के साथ रहकर पढ़ाई कर रही थी। उसकी मौत के बाद क्षेत्र में मातम के साथ ही पेयजल व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में लंबे समय से पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें आती रही हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि सुहानी की मौत दूषित पानी से ही हुई या नहीं—इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है—सवाल यह है कि अगर पेयजल को लेकर शिकायतें पहले से सामने आ रही थीं तो जल संस्थान ने समय रहते उनकी गंभीरता से जांच क्यों नहीं की?

मौत के बाद टैंकर, पहले क्यों नहीं जांची गई पाइपलाइन?

सुहानी की मौत के बाद जल संस्थान ने पेयजल लाइनों की जांच शुरू करने की बात कही है। प्रभावित क्षेत्र में टैंकरों के माध्यम से साफ पानी उपलब्ध कराने की भी बात कही गई है। लेकिन यही कार्रवाई अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।

यदि किसी इलाके में गंदे पानी की शिकायतें मिल रही थीं तो पाइपलाइन, लीकेज, सीवर क्रॉस-कनेक्शन, पानी के स्रोत और सप्लाई लाइन की जांच पहले क्यों नहीं की गई? क्या जल संस्थान की व्यवस्था शिकायत आने के बाद सिर्फ अस्थायी समाधान तक सीमित है?

टैंकर भेजना तत्काल राहत हो सकती है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। असली सवाल यह है कि जिस पाइपलाइन से घरों तक पानी पहुंच रहा है, उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की नियमित निगरानी कौन कर रहा है?

एक मौत, कई सवाल!

पीलिया की पुष्टि के बाद छात्रा की मौत हुई है। इसे दूषित पेयजल से जोड़ने से पहले स्वास्थ्य विभाग की वैज्ञानिक जांच जरूरी है। लेकिन उसी क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता को लेकर लोगों की शिकायतें सामने आना प्रशासन और जल संस्थान के लिए गंभीर संकेत जरूर है।

अब जांच सिर्फ यह तय करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि पानी दूषित था या नहीं। यह भी सामने आना चाहिए कि पानी की जांच कब-कब हुई, किस स्तर पर हुई, सैंपल में क्या मिला, पाइपलाइन की स्थिति क्या है और शिकायत मिलने के बाद किस अधिकारी ने क्या कार्रवाई की।

जल संस्थान की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल!

हल्द्वानी जैसे तेजी से फैलते शहर में पेयजल नेटवर्क लगातार दबाव में है। जगह-जगह पुरानी पाइपलाइन, लीकेज और दूसरी लाइनों के संपर्क में आने की आशंका जैसे मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में सिर्फ शिकायत आने पर लाइन ठीक करने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

जरूरत इस बात की है कि संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित रूप से पेयजल के नमूने लिए जाएं और उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। जहां गंदे पानी की शिकायत मिले, वहां सिर्फ टैंकर भेजने के बजाय स्रोत से लेकर घर की टोंटी तक पूरी सप्लाई लाइन की जांच हो।

सीएमओ ने दिए जांच के संकेत!

मामले का संज्ञान लेते हुए सीएमओ नैनीताल डॉ. रश्मि पंत ने जांच कराए जाने की बात कही है। वहीं जल संस्थान के अधिशासी अभियंता रविशंकर लोशाली के मुताबिक पेयजल लाइनों की जांच शुरू कर दी गई है और समस्या को चिन्हित कर दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रभावित क्षेत्र में टैंकरों के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है।

अब देखना यह होगा कि यह जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है या फिर पानी की गुणवत्ता, पाइपलाइन और पूर्व शिकायतों की पूरी पड़ताल कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाती है।

अब जवाब सिर्फ पानी का नहीं, व्यवस्था का चाहिए!

सुहानी की मौत का वास्तविक कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन इस घटना ने एक ऐसा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब जल संस्थान और जिम्मेदार विभागों को देना होगा।

अगर शिकायतें थीं तो जांच कब हुई?
अगर पानी की गुणवत्ता संदिग्ध थी तो कार्रवाई कब हुई?
अगर पाइपलाइन में समस्या थी तो उसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया?

एक परिवार ने अपनी बेटी खो दी। अब व्यवस्था के सामने चुनौती सिर्फ प्रभावित इलाके में टैंकर भेजने की नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि हल्द्वानी के किसी दूसरे घर में किसी और सुहानी की कहानी दोहरानी न पड़े।

पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा में लापरवाही की गुंजाइश बेहद कम होती है। इसलिए अब जरूरत तत्काल राहत से आगे बढ़कर वैज्ञानिक जांच, नियमित जल परीक्षण, पाइपलाइन ऑडिट और शिकायतों पर जवाबदेही तय करने की है।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि पानी साफ है या गंदा—सवाल यह भी है कि पानी साफ रखने की जिम्मेदारी निभाने वाला सिस्टम आखिर कितना सतर्क है।

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