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दस साल से जमीन अपनी, हक पराया!

1499 परिवारों का मालिकाना हक फिर एक साल की मोहलत में अटका, सवाल—दस साल में 38 फाइलें ही क्यों निपटीं?

दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | लालकुआं

लालकुआं में मकान खड़े होते रहे, बाजार बढ़ता रहा, पीढ़ियां बदलती रहीं और लोगों ने अपनी जिंदगी इसी जमीन पर बिता दी। लेकिन जिस जमीन को लोग अपना मानकर दशकों से घर बनाए बैठे हैं, उसका मालिकाना हक आज भी सरकारी फाइलों में अटका है। वर्ष 2016 में शुरू हुई प्रक्रिया वर्ष 2026 में भी पूरी नहीं हो पाई। अब सरकार ने एक बार फिर एक साल का समय बढ़ा दिया है। उम्मीद फिर जगी है, लेकिन लालकुआं के लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—दस साल में जब 1537 परिवारों में से केवल 38 को मालिकाना हक मिल सका, तो अब एक साल में बाकी 1499 परिवारों की फाइलें कैसे दौड़ेंगी?

लालकुआं की कहानी सिर्फ जमीन के कागज की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां नागरिक वर्षों तक दस्तावेज जुटाता है, शुल्क जमा करता है और सरकारी प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करता है, लेकिन फाइल की रफ्तार उसकी जिंदगी से कहीं धीमी रहती है।

वर्ष 2016 में तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने नगर पंचायत क्षेत्र के पात्र पट्टेदारों और कब्जाधारकों को मालिकाना हक देने की प्रक्रिया शुरू की थी। लोगों को लगा था कि वर्षों पुराना इंतजार अब खत्म होगा। वर्ष 2018 में आवेदन लिए गए, शुल्क जमा कराया गया और पत्रावलियां सरकारी दफ्तरों तक पहुंचीं। तत्कालीन वित्त मंत्री स्वर्गीय प्रकाश पंत ने भी तहसील में शिविर लगाकर प्रक्रिया में तेजी का भरोसा दिलाया था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर सामने ला दिया। हजारों कागज सरकारी कार्यालयों में जमा होते रहे, मगर मालिकाना हक के दस्तावेज घरों तक पहुंचने की रफ्तार बेहद धीमी रही। वर्ष 2021 में 38 परिवारों को दस्तावेज मिल सके और बाकी परिवार फिर इंतजार की कतार में खड़े रह गए।

समय सीमा खत्म हुई तो शासन स्तर पर उसे बढ़ाया गया। वर्ष 2022 में भी अतिरिक्त समय दिया गया। अब चार अक्टूबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में एक बार फिर प्रक्रिया के लिए एक साल की मोहलत दी गई है।

यानी दस साल बाद भी समाधान के बजाय समय सीमा आगे बढ़ रही है।

यहां सवाल सरकार के फैसले पर नहीं, फैसले के क्रियान्वयन की रफ्तार पर है।

लालकुआं को 1975 में राजस्व गांव का दर्जा मिला था और 1978 में नगर पंचायत बनी। आज यहां हजारों की आबादी है। लोगों ने अपने खून-पसीने की कमाई से मकान बनाए हैं। कहीं दो मंजिल, कहीं तीन मंजिल के भवन खड़े हैं। बाजार है, कारोबार है, बिजली है, पानी है और नगर निकाय की व्यवस्थाएं हैं। फिर भी जमीन के मालिकाना हक का अंतिम कागज लोगों के हाथ में नहीं है।

यह विडंबना ही है कि जिस संपत्ति पर लोग वर्षों से रह रहे हैं, उसके कागजी अधिकार के लिए उन्हें बार-बार तहसील और संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।

समस्या उन लोगों के लिए और बढ़ जाती है जिन्होंने हाल के वर्षों में इन मकानों को खरीदा है। मकान खरीदने के बाद भी हाउस टैक्स पुराने मालिक के नाम पर चल रहा है। बिजली और पानी के कनेक्शन के हस्तांतरण में दिक्कतें हैं। यानी संपत्ति खरीदने के बाद भी नए स्वामी को अपने ही घर को सरकारी अभिलेखों में पूरी तरह अपने नाम कराने के लिए अलग-अलग स्तरों पर परेशान होना पड़ रहा है।

ऐसे में सरकार को अब केवल समय सीमा बढ़ाने से आगे बढ़ना होगा। जरूरत इस बात की है कि लंबित पत्रावलियों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए, पात्रता की प्रक्रिया को समयबद्ध किया जाए और हर परिवार को बताया जाए कि उसकी फाइल किस स्तर पर लंबित है।

विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट का कहना है कि उन्होंने विधायक बनने के बाद ही इस मामले में समय सीमा बढ़वाने के लिए प्रयास शुरू किए थे और अब प्रक्रिया को फिर खुलवाया गया है। नगर पंचायत अध्यक्ष सुरेंद्र लोटनी ने भी भूमि स्वामित्व के साथ हाउस टैक्स, बिजली-पानी और अन्य तकनीकी समस्याओं के समाधान की जरूरत बताई है।

अब लालकुआं की जनता सरकार से सिर्फ आश्वासन नहीं, परिणाम चाहती है।

क्योंकि दस साल बहुत होते हैं।

एक परिवार के लिए दस साल इंतजार का मतलब सिर्फ एक फाइल का लंबित रहना नहीं है। इसका मतलब है संपत्ति बेचने, खरीदने, नामांतरण कराने, ऋण लेने, उत्तराधिकार तय करने और अगली पीढ़ी को संपत्ति हस्तांतरित करने जैसी तमाम प्रक्रियाओं में अनिश्चितता।

इसलिए अब सवाल यह नहीं कि मालिकाना हक की समय सीमा एक साल और बढ़ गई। सवाल यह है कि क्या इस बार फाइलों की चाल बदलेगी?

क्या 1499 परिवारों को अगले एक साल में उनका अधिकार मिलेगा?

या फिर एक साल बाद लालकुआं के लोगों के सामने फिर वही कहानी होगी—समय सीमा खत्म, फाइल अधूरी और मालिकाना हक फिर अगली तारीख के इंतजार में?

लालकुआं की जमीन पर मकान भले लोगों के हों, लेकिन कागज पर अधिकार का यह अधूरापन अब सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं रहा। यह हजारों लोगों के कानूनी और संपत्ति अधिकार से जुड़ा सवाल बन चुका है।

सवाल साफ है—लालकुआं को अब एक और तारीख नहीं, इस बार मालिकाना हक का अंतिम कागज चाहिए।

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