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रावत की धन्यवाद यात्रा पर सैलजा का संगठन मंत्र!

दिल्ली में सफाई से पहले हरिद्वार में सैलजा का दो टूक संदेश- कोई व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं, सवाल- 2027 की चुनावी तैयारी के बीच आखिर किस बात का आभार?

दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो, देहरादून।

उत्तराखंड कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ अब सिर्फ एक राजनीतिक यात्रा नहीं रह गई है। यह यात्रा कांग्रेस के भीतर व्यक्ति बनाम संगठन की उस बहस का केंद्र बन गई है, जो विधानसभा चुनाव-2027 से पहले पार्टी की अंदरूनी राजनीति को फिर सतह पर ले आई है।

रावत की यात्रा को लेकर कांग्रेस हाईकमान की आपत्ति के बीच बुधवार को हरिद्वार पहुंचीं प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने बिना रावत का नाम लिए दो टूक संदेश दिया—कोई भी व्यक्ति पार्टी और संगठन से बड़ा नहीं हो सकता। यही एक लाइन अब उत्तराखंड कांग्रेस की मौजूदा सियासत का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश मानी जा रही है।

सैलजा ने हरिद्वार में शिवमूर्ति चौक से सुभाष घाट तक पैदल मार्च किया। रावत की यात्रा को लेकर सवाल हुआ तो उन्होंने विवाद को विस्तार देने से बचते हुए कांग्रेस के संगठन और उसके लंबे इतिहास का हवाला दिया। उनके साथ प्रदेश के कई वरिष्ठ नेता भी मौजूद थे। संदेश साफ था—चेहरे चाहे कितने भी बड़े हों, अंतिम ताकत संगठन की ही होगी।

आभार किस बात का, सवाल यहीं से शुरू!

रावत की ओर से यात्रा को जनता और शुभचिंतकों के प्रति आभार जताने तथा जनसंवाद का माध्यम बताया गया है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में अब दूसरा सवाल उठ रहा है—आखिर इस समय आभार किस बात का?

जब उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है, भाजपा संगठनात्मक स्तर पर बूथ और घर-घर तक पहुंच बनाने की तैयारी में जुटी है, तब कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शामिल हरीश रावत धन्यवाद यात्रा लेकर जनता के बीच निकले हैं। भाजपा ने 2027 के लिए संगठनात्मक कैलेंडर और बूथ स्तर तक कार्यक्रमों पर जोर दिया है।

सवाल रावत के जनता के बीच जाने पर नहीं है। सवाल यह है कि क्या यह यात्रा कांग्रेस की घोषित चुनावी रणनीति का हिस्सा है या वरिष्ठ नेता की व्यक्तिगत राजनीतिक पहल?

यही वह बिंदु है जहां से सैलजा और रावत के बीच मतभेद सामने आए।!

प्रदेश प्रभारी ने पहले रावत को पत्र लिखकर यात्रा आगे न बढ़ाने को कहा था। पार्टी की आपत्ति थी कि यात्रा को लेकर प्रदेश कांग्रेस संगठन और प्रभारी स्तर पर चर्चा नहीं हुई और यह पार्टी के निर्धारित कार्यक्रमों के समानांतर दिखाई दे रही थी।

रावत ने इसके बावजूद यात्रा शुरू की। जसपुर से हल्द्वानी तक उनकी सक्रियता में समर्थक और कांग्रेस के कई नेता भी दिखाई दिए। रावत ने इसे जनता से संवाद और बदलाव की आवाज समझने की कोशिश बताया।

यहीं से कांग्रेस के भीतर असली सवाल खड़ा हुआ—यदि यात्रा व्यक्तिगत है तो पार्टी के नेता इसमें क्यों हैं? और यदि कांग्रेस के नेता इसमें शामिल हैं तो क्या इसे महज व्यक्तिगत यात्रा माना जा सकता है?

दिल्ली से पहले हरिद्वार का संदेश!

रावत को यात्रा को लेकर अपना पक्ष पार्टी नेतृत्व के सामने रखने के लिए दिल्ली जाना था। सात अक्टूबर को उनकी प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा से प्रस्तावित मुलाकात भी चर्चा में रही, हालांकि यह मुलाकात टल गई।

ऐसे समय में हरिद्वार से सैलजा का ‘संगठन मंत्र’ सामने आया है।

“कोई व्यक्ति पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता।”

सैलजा ने रावत का नाम नहीं लिया, लेकिन सवाल रावत की यात्रा को लेकर ही था। इसलिए कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में इस बयान को मौजूदा विवाद के संदर्भ में देखा जा रहा है।

रावत बनाम संगठन नहीं, सवाल कांग्रेस की दिशा का

हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के ऐसे वरिष्ठ नेताओं में हैं जिनकी अपनी राजनीतिक पहचान और समर्थकों का बड़ा आधार रहा है। यही कारण है कि उनकी राजनीतिक सक्रियता को केवल व्यक्तिगत कार्यक्रम मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

लेकिन कांग्रेस के सामने चुनावी चुनौती भी उतनी ही स्पष्ट है।

पार्टी लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है और 2027 के चुनाव के लिए उसे संगठन, नेतृत्व और चुनावी रणनीति के स्तर पर एक साझा दिशा तय करनी है। ऐसे समय में यदि पार्टी के भीतर यह सवाल उठे कि राजनीतिक कार्यक्रम कौन तय करेगा—व्यक्ति या संगठन?—तो विवाद केवल यात्रा तक सीमित नहीं रहता।

रावत के लिए यह यात्रा जनता से संवाद और समर्थकों के बीच सक्रियता का माध्यम हो सकती है। कांग्रेस संगठन के लिए सवाल यह है कि चुनाव से पहले सभी वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक गतिविधियां एक साझा रणनीति के तहत हों।

धन्यवाद यात्रा रुकी, लेकिन सवाल बाकी

ताजा घटनाक्रम में हाईकमान की हिदायत के बाद रावत ने अपनी आगे की प्रस्तावित धन्यवाद यात्राएं स्थगित करने की बात कही है। बताया गया है कि उनकी नौ और यात्राएं प्रस्तावित थीं।

यात्रा का अगला चरण भले फिलहाल रुक गया हो, लेकिन इससे कांग्रेस के भीतर उठे राजनीतिक सवाल खत्म नहीं हुए हैं।

2027 की तैयारी में कांग्रेस का चेहरा कौन होगा? संगठन की रणनीति क्या होगी? वरिष्ठ नेताओं की भूमिका किस तरह तय होगी? और व्यक्तिगत राजनीतिक यात्राओं को पार्टी के सामूहिक अभियान में किस तरह जोड़ा जाएगा?

इन सवालों के जवाब अब दिल्ली की बातचीत और आने वाले दिनों में कांग्रेस की रणनीति से मिलने हैं।

फिलहाल हरिद्वार से सैलजा का संदेश बेहद स्पष्ट है—

नेता बड़े हो सकते हैं, लेकिन संगठन से बड़े नहीं।

और रावत की धन्यवाद यात्रा ने कांग्रेस के सामने एक और सवाल खड़ा कर दिया है—

जब चुनावी रण की तैयारी शुरू हो चुकी है, तब कांग्रेस धन्यवाद यात्रा कर रही है या 2027 की राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है?

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