

डीएम की एक रात की रेड ने खोली आबकारी निगरानी की पोल, राजधानी में ही ओवररेटिंग से लेकर स्टॉक तक गड़बड़ियां!
आईएसबीटी में 42 बोतलों के बैच नंबर रिकॉर्ड से नहीं मिले; रेट लिस्ट-शिकायत नंबर गायब, अनधिकृत सेल्समैन भी मिले!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो
देहरादून।
शराब दुकानों पर ओवररेटिंग की शिकायतों के बीच जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के निर्देश पर हुई देर रात की औचक जांच ने राजधानी की आबकारी निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। माजरा, पटेलनगर, आईएसबीटी, प्रेमनगर, जाखन और राजपुर रोड की दुकानों में जिला प्रशासन की अलग-अलग टीमों ने जांच की। इस दौरान ओवररेटिंग, स्टॉक रजिस्टर में खामियां, रेट लिस्ट और शिकायत नंबर का प्रदर्शन न होना तथा अनधिकृत सेल्समैन मिलने जैसी अनियमितताएं सामने आईं।
आईएसबीटी में सबसे ज्यादा सवाल तब उठे, जब जांच में दुकान पर ओवररेटिंग की शिकायत सही पाई गई। यहां रखी 42 शराब की बोतलों के बैच नंबर उपलब्ध अभिलेखों से मेल नहीं मिले। दुकान पर अनधिकृत सेल्समैन मिले और निर्धारित रेट लिस्ट भी प्रदर्शित नहीं थी। टीम ने स्टॉक और बिक्री अभिलेखों की भी जांच की।
प्रेमनगर में स्टॉक रजिस्टर अपडेट नहीं मिला, जबकि अनधिकृत सेल्समैन भी पाए गए। जाखन और राजपुर रोड की कई दुकानों पर भी स्टॉक रजिस्टर अद्यतन नहीं था। कुछ दुकानों पर रेट लिस्ट और आबकारी विभाग का शिकायत नंबर तक प्रदर्शित नहीं मिला। जांच में ओवररेटिंग के मामले भी सामने आए।
एक रात की रेड, निगरानी पर बड़ा सवाल
औचक जांच में एक साथ कई तरह की अनियमितताएं मिलने से सवाल यह है कि नियमित आबकारी निरीक्षण आखिर कितना प्रभावी है?
राजधानी में आबकारी विभाग का पूरा तंत्र मौजूद है। ऐसे में जिन दुकानों पर स्टॉक, रेट लिस्ट और सेल्समैन से जुड़ी कमियां मिलीं, वहां पहले हुए निरीक्षणों में ये खामियां क्यों नहीं पकड़ी गईं? ओवररेटिंग की शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई के लिए जिला प्रशासन को औचक अभियान क्यों चलाना पड़ा?
इन सवालों का जवाब अब आबकारी विभाग को देना होगा।
देहरादून में हुई कार्रवाई के बाद अब सवाल प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों की दुकानों को लेकर भी है। राजधानी में ही यदि औचक जांच में ऐसी अनियमितताएं मिल रही हैं तो पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण की स्थिति क्या है, इसका भी आकलन जरूरी है।
विभिन्न क्षेत्रों से आबकारी निरीक्षकों के फोन नहीं उठने की शिकायतें सामने आने की बात भी कही जा रही है। इन शिकायतों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित मामलों में जरूरी है, लेकिन शिकायत निस्तारण की व्यवस्था की सक्रियता पर सवाल उठना तय है।
जिला प्रशासन की कार्रवाई के बाद संबंधित दुकानों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। इससे भी अहम यह होगा कि विभाग उन दुकानों के पिछले निरीक्षण रिकॉर्ड की समीक्षा करता है या नहीं, जहां अब अनियमितताएं मिली हैं।
क्योंकि सवाल सिर्फ दुकानदारों पर कार्रवाई का नहीं है,सवाल यह भी है कि निगरानी करने वाला तंत्र इन खामियों को पहले क्यों नहीं पकड़ पाया।
जब राजधानी में एक रात की औचक रेड में इतनी अनियमितताएं सामने आ गईं, तो नियमित आबकारी निगरानी में ये खामियां क्यों नहीं दिखीं?
