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खेत में किसान की मेहनत तैयार, मंडी में सरकार की व्यवस्था अधूरी!

आय दोगुनी करने के दावों के बीच धान बेचने को तरस रहा अन्नदाता, कहीं कांटे कम तो कहीं पोर्टल बंद—जिम्मेदारों की तैयारी पर उठे सवाल!

 

दर्पण न्यूज 24/7 | प्रमोद बमेटा

गदरपुर/बाजपुर। सरकार के मंचों से किसान की आय दोगुनी करने के दावे खूब सुनाई देते हैं। किसान हित में नीतियां बनाने और उसकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के संकल्प भी बार-बार दोहराए जाते हैं। लेकिन तराई की मंडियों में पहुंचते ही इन दावों की जमीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। खेत में महीनों की मेहनत के बाद धान तैयार है, कटकर मंडियों तक पहुंच चुका है, लेकिन सरकारी खरीद व्यवस्था कहीं कांटों की कमी में उलझी है तो कहीं पोर्टल के इंतजार में।

किसान की फसल तैयार थी, फिर सरकारी तंत्र की तैयारी क्यों नहीं? यही सवाल इस समय तराई के खेत-खलिहानों से लेकर मंडियों तक गूंज रहा है।

गदरपुर में धान खरीद की अव्यवस्था को लेकर किसानों का गुस्सा आखिरकार तहसील तक पहुंच गया। भारतीय किसान यूनियन के कार्यकर्ताओं ने तहसील परिसर में प्रदर्शन किया और सरकार व जिला प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। किसान नेता विक्रम सिंह गोराया ने तहसील का मुख्य द्वार बंद कर विरोध जताया। ताला लगाने के लिए चाबी नहीं मिली तो उन्होंने अपने हरे साफे से चैनल गेट बांध दिया और साथियों के साथ वहीं धरने पर बैठ गए। बाद में एसडीएम डॉ. अमृता शर्मा को संबोधित ज्ञापन रजिस्ट्रार कानूनगो हेमराज चौहान को सौंपा गया।

किसानों की शिकायत है कि धान की फसल तैयार होकर मंडी पहुंच रही है, लेकिन पर्याप्त कांटे नहीं होने से समय पर तौल नहीं हो पा रही। उन्होंने गदरपुर क्षेत्र में कम से कम 15 अतिरिक्त कांटे लगाने और क्रय केंद्र बढ़ाने की मांग की है।

सरकारी पक्ष में मंडी सचिव आशा गोस्वामी का कहना है कि किसानों की धान खरीद के लिए शासन की ओर से 18 क्रय केंद्र बनाए गए हैं और तौल केंद्रों पर किसानों को परेशानी न हो, इसके लिए आवश्यक इंतजाम किए गए हैं।

लेकिन सवाल यह है कि यदि इंतजाम पर्याप्त हैं तो किसान सड़क से तहसील और तहसील से धरने तक पहुंचने को मजबूर क्यों हुआ?

बाजपुर की तस्वीर भी व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े कर रही है। धान कटकर मंडियों में पहुंच चुका है और सरकारी खरीद शुरू होने की निर्धारित तिथि निकल चुकी है, लेकिन सरकारी खरीद का पोर्टल अब तक नहीं खुलने की बात सामने आ रही है। यानी जिस किसान को अपनी फसल सरकारी व्यवस्था के तहत बेचनी है, उसके सामने खरीद की पहली डिजिटल सीढ़ी ही अटकी हुई है।

यहीं से सरकार के उन दावों की असली परीक्षा शुरू होती है, जिनमें डिजिटल व्यवस्था को पारदर्शी, तेज और किसान हितैषी बताया जाता है।

नई व्यवस्था में पंजीकरण और सत्यापन के लिए ओटीपी, फेस आईडी, रेटिना और फेस स्कैनिंग जैसी प्रक्रियाओं की बात सामने आ रही है। तराई के कई किसानों की जमीन महिलाओं के नाम है, जबकि कुछ भूमि मालिक बाहर रहते हैं और खेती रिश्तेदार या स्थानीय मुंशी संभालते हैं। ऐसे में बायोमेट्रिक सत्यापन की शर्तें जमीन पर कितनी व्यावहारिक होंगी, इसका जवाब व्यवस्था को देना होगा।

राइस मिलर्स की अपनी परेशानी है। वर्ष 2022 से खरीद वर्ष 2025-26 तक धान खरीद और विभिन्न मदों में करीब 500 करोड़ रुपये के भुगतान लंबित होने का दावा किया जा रहा है। इसके साथ ही नई नीति में प्रत्येक राइस मिलर के लिए 2.5 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी का प्रावधान बताया जा रहा है। पुराने भुगतान अटके हों और नई खरीद के लिए बड़ी बैंक गारंटी की जरूरत हो तो खरीद व्यवस्था में मिलर्स की भागीदारी प्रभावित होना भी एक व्यावहारिक सवाल है।

उधर कच्चे आढ़तियों के भी पिछले वर्षों के प्रतिपूर्ति भुगतान लंबित बताए जा रहे हैं। यानी जिस व्यवस्था के तीन प्रमुख हिस्से—किसान, आढ़ती और मिलर—माने जाते हैं, तीनों किसी न किसी भुगतान या प्रक्रिया संबंधी अड़चन का सामना कर रहे हैं।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं कि धान खरीद क्यों नहीं शुरू हुई? सवाल यह भी है कि जब खरीद की तारीख पहले से तय थी, फसल के मंडी में पहुंचने का समय पहले से मालूम था और हर वर्ष यही खरीद प्रक्रिया दोहराई जाती है, तो पोर्टल, पंजीकरण, कांटे, मिलर्स, भुगतान और भंडारण जैसी तैयारियां समय रहते पूरी क्यों नहीं की गईं?

क्या जिम्मेदार महकमे किसान के मंडी पहुंचने का इंतजार करते रहे?

किसान के लिए यह देरी महज सरकारी फाइल में अटकी हुई प्रक्रिया नहीं है। उसकी फसल मंडी में खड़ी है। उसे अगली फसल की तैयारी करनी है, मजदूरी और खाद-बीज का भुगतान करना है, घर के खर्च चलाने हैं और बैंक-कर्ज की किश्तें चुकानी हैं। धान की तौल और भुगतान में देरी का सीधा असर उसकी पूरी कृषि व्यवस्था पर पड़ता है।

सरकार किसान की आय दोगुनी करने का सपना दिखाती है, लेकिन किसान आज अपनी तैयार फसल बेचने की बुनियादी व्यवस्था मांग रहा है।

यही वह अंतर है जो सरकारी दावों को आईना दिखाता है।

नीतियां कागज पर कितनी भी शानदार क्यों न हों, उनका मूल्यांकन मंडी के कांटे पर होता है। डिजिटल पोर्टल कितना आधुनिक है, इसका प्रमाण सरकारी विज्ञप्ति नहीं बल्कि किसान का सफल पंजीकरण है। भुगतान व्यवस्था कितनी तेज है, इसका प्रमाण दावा नहीं बल्कि किसान के खाते में समय पर पहुंची रकम है। और क्रय केंद्र कितने हैं, इसका प्रमाण सूची नहीं बल्कि मंडी में इंतजार कर रहे किसानों की संख्या बताती है।

तराई का किसान आज सरकार से कोई एहसान नहीं मांग रहा। वह अपनी फसल का निर्धारित मूल्य और उसे बेचने की सुचारु व्यवस्था मांग रहा है।

सवाल सीधा है—जब किसान ने अपनी जिम्मेदारी निभाकर खेत में फसल तैयार कर दी, तो क्या सरकारी तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार था?

अगर जवाब हां है तो फिर मंडियों में इंतजार क्यों है, कांटों को लेकर किसान सड़कों पर क्यों है और सरकारी खरीद पोर्टल को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

सरकार के दावों और मंडी की हकीकत के बीच खड़ी यही दूरी अब जिम्मेदार अधिकारियों और खरीद व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है। क्योंकि किसान की फसल सरकार की फाइलों में नहीं, मंडी के खुले आसमान के नीचे खड़ी है—और वहां हर गुजरता दिन व्यवस्था की तैयारी का हिसाब मांग रहा है।

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