








कितना डैमेज कंट्रोल कर लेंगे साहब? लालकुआं विधानसभा में सड़कें बदहाल, फिर भी विकास के दावे बेहिसाब।
लालकुआं-बिंदुखत्ता समेत विधानसभा बदहाल सड़कों ने फिर उठाए सवाल!
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो | प्रमोद बमेटा
लालकुआं। लालकुआं विधानसभा में बदहाल सड़कों की तस्वीर इन दिनों जगह जगह से सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। आज बिन्दुखता के समाजसेवी धीरज जोशी की ओर से साझा किए गए वीडियो में यहां की मुख्य सड़क पर जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे, उनमें जमा बरसाती पानी और उखड़ी सड़क साफ दिखाई दे रही है। बारिश के बाद सड़क की हालत ऐसी हो गई है कि वाहन चालकों को पानी के नीचे छिपे गड्ढों की गहराई का अंदाजा तक नहीं लग पा रहा है। दोपहिया वाहन चालक जोखिम उठाकर निकलने को मजबूर हैं।
लेकिन यह मामला केवल बिंदुखत्ता की एक सड़क का नहीं है। लालकुआं विधानसभा के दूसरे हिस्सों में भी सड़कों की बदहाली, गड्ढों और जलभराव की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। कहीं सड़क उखड़ी हुई है, कहीं बड़े-बड़े गड्ढे राहगीरों के लिए परेशानी बने हुए हैं तो कहीं बरसात के दौरान जलभराव ने आवागमन मुश्किल कर दिया है। ऐसे में लालकुआं-बिंदुखत्ता की सड़क की तस्वीर पूरी विधानसभा की सड़क व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
लालकुआं विधानसभा में सड़कों का इस्तेमाल रोजाना हजारों लोग करते हैं। स्कूली बच्चों से लेकर बुजुर्ग, व्यापारी, नौकरी-पेशा लोग और मरीज तक इन्हीं रास्तों से होकर गुजरते हैं। सड़क की खराब स्थिति का सबसे ज्यादा असर उन्हीं लोगों पर पड़ता है जिन्हें हर दिन इन रास्तों से गुजरना पड़ता है। बारिश के दौरान परेशानी और बढ़ जाती है और सड़क के गड्ढे दुर्घटना का खतरा भी बढ़ाते हैं।
स्थानीय लोगों की शिकायत है कि सड़क खराब होने के बाद कई बार अस्थायी तौर पर गड्ढों को मिट्टी या बजरी से भर दिया जाता है, लेकिन बरसात आते ही स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है। जनता अब ऐसी खानापूर्ति से आगे बढ़कर सड़क का स्थायी और गुणवत्तापूर्ण समाधान चाहती है। लोगों का सवाल है कि जब एक ही सड़क बार-बार खराब होती है तो उसकी मूल समस्या को दूर करने की कोशिश क्यों नहीं होती और निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।
सड़क की यह हालत ऐसे समय में सामने आ रही है जब आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। राजनीतिक मंचों पर सरकार की उपलब्धियों और विकास कार्यों का बखान भी सुनाई देने लगा है। पुनः टिकट की चाह रखने वाले नेता जहां भी मौका मिल रहा है, सरकार के विकास कार्यों का पुलिंदा जनता के सामने खोल रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि माननीय, आपको जनता ने सरकार की उपलब्धियां गिनाने के लिए नहीं, अपने विधानसभा क्षेत्र की जनता की सुध लेने के लिए चुना था। सरकार के स्तर पर प्रदेश में हुए विकास की अपनी जगह अहमियत है, लेकिन एक जनप्रतिनिधि के लिए उसके अपने क्षेत्र की सड़कें, पानी, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाएं सबसे पहली कसौटी होती हैं।
जब जनता की आंखों के सामने सड़कें गड्ढों में तब्दील हों, बरसात में रास्ते तालाब बन जाएं और वाहन चालक हर कदम पर दुर्घटना के खतरे के बीच सफर करें, तब विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भाषणों में विकास कितना भी चमकदार क्यों न हो, जनता को उसका असर अपनी सड़क पर दिखाई देना चाहिए।
कमिश्नर और जिलाधिकारी से भी अब क्षेत्रवासियों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। लालकुआं-बिंदुखत्ता मार्ग की मौजूदा स्थिति को देखते हुए केवल एक सड़क की मरम्मत के बजाय पूरी लालकुआं विधानसभा की प्रमुख सड़कों की स्थिति का स्थलीय निरीक्षण कराया जाना जरूरी है। जहां सड़कें खराब हैं, जहां जलभराव है और जहां गड्ढे दुर्घटना का कारण बन सकते हैं, वहां तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन को यह भी देखना होगा कि बार-बार होने वाली मरम्मत के बावजूद सड़कें क्यों खराब हो रही हैं और निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी किस स्तर पर हो रही है।
जनता का सवाल बेहद सीधा है। क्या किसी बड़े हादसे के बाद जिम्मेदार विभाग जागेगा या हादसे से पहले ही सड़कों को सुरक्षित किया जाएगा? क्या हर बरसात में गड्ढों में मिट्टी और बजरी डालकर खानापूर्ति होती रहेगी या अब स्थायी समाधान निकलेगा?
आगामी चुनाव में यही सड़कें और यही बुनियादी समस्याएं जनता के सवालों का हिस्सा बन सकती हैं। चुनाव के समय जनता के दरवाजे पर पहुंचकर हाथ जोड़ना और आशीर्वाद मांगना आसान है, लेकिन पांच साल तक उसी जनता की समस्याओं के बीच खड़े रहना असली जनसेवा है। जिस जनता ने अपना वोट देकर जनप्रतिनिधि चुना, वह अब भाषणों से ज्यादा अपने आसपास की हकीकत देख रही है।
लालकुआं-बिंदुखत्ता की बदहाल सड़क की यह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ एक सड़क का दर्द नहीं, बल्कि उस पूरे क्षेत्र की आवाज बनकर सामने आई है जहां लोग बेहतर सड़क और सुरक्षित आवागमन की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
अब सवाल सरकार की उपलब्धियां गिनाने का नहीं, अपने विधानसभा क्षेत्र की बदहाल व्यवस्था का हिसाब देने का है।
लालकुआं की आवाम का सवाल साफ है—कितना डैमेज कंट्रोल कर लेंगे साहब, जब पूरी विधानसभा की सड़कें ही विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रही हों?
अब हमको भाषण नहीं, सड़क चाहिए। दावे नहीं, जमीन पर काम चाहिए। और इस बार शायद जनता भी रोटियां सेंकने वालों के लिए अपनी खिचड़ी तैयार कर रही है—जिसमें स्वाद से ज्यादा पांच साल का हिसाब होगा।
