

उत्तराखंड विधानसभा सत्र के बीच सियासी भूचाल! उमेश कुमार ने किया इस्तीफे का ऐलान, विपक्ष पर साधा निशाना!
किसानों की बर्बाद फसलों पर साथ नहीं मिला तो लिया बड़ा फैसला, भाजपा-कांग्रेस दोनों से बनाई दूरी!
दर्पण न्यूज 24/7 | उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा का दो दिवसीय सत्र शुरू होते ही प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। एक ओर कांग्रेस ने सरकार को घेरने की रणनीति तैयार की है, वहीं हरिद्वार जिले की खानपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। उमेश कुमार ने अपने फैसले के पीछे किसानों के मुद्दों पर विपक्ष से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने को प्रमुख वजह बताया है।
किसानों के मुद्दे पर साथ नहीं मिला, तो विधायकी छोड़ने का ऐलान!
निर्दलीय विधायक उमेश कुमार का कहना है कि हरिद्वार में किसानों की फसलें बर्बाद हुईं, लेकिन किसानों की इस समस्या को मजबूती से उठाने में उन्हें विपक्ष का अपेक्षित साथ नहीं मिला। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि जब जनता के महत्वपूर्ण मुद्दों पर ही एकजुटता नहीं दिखाई देती, तो ऐसे में विधायक बने रहने का क्या औचित्य है।
इसी नाराजगी के चलते उन्होंने बुधवार को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा की है। हालांकि, इस्तीफे की घोषणा और उसके औपचारिक रूप से स्वीकार होने की स्थिति अलग-अलग है। उनके इस फैसले का अंतिम राजनीतिक असर इस्तीफे की वास्तविक स्थिति और आगे की रणनीति स्पष्ट होने के बाद ही सामने आएगा।
न भाजपा का साथ, न कांग्रेस का दामन थामने को तैयार!
उमेश कुमार ने अपने बयान में भाजपा और कांग्रेस, दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में शामिल होने की संभावनाओं को भी खारिज किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न तो वह भाजपा में जा रहे हैं और न ही कांग्रेस में शामिल होने की उनकी योजना है।
उन्होंने अपने राजनीतिक रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि वह भाजपा में जाकर त्रिवेंद्र सिंह रावत जिंदाबाद के नारे नहीं लगा सकते और न ही कांग्रेस में शामिल होकर हरीश रावत जिंदाबाद बोल सकते हैं। उनके इस बयान से संकेत मिलता है कि फिलहाल वह प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों से दूरी बनाए रखना चाहते हैं।
सियासी सवाल: इस्तीफा दबाव की रणनीति या सिद्धांतों की लड़ाई?
उमेश कुमार की घोषणा ने उत्तराखंड की राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसानों के मुद्दे पर विपक्ष का साथ नहीं मिलना ही उनके फैसले की निर्णायक वजह है? क्या उनका इस्तीफा प्रदेश की राजनीति में कोई नया मोड़ लाएगा? और क्या निर्दलीय विधायक के रूप में उनकी आगे की भूमिका पहले से अधिक आक्रामक होगी?
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उमेश कुमार ने अपने बयान के जरिए विपक्ष की एकजुटता और राजनीतिक दलों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर रहेंगी कि वह घोषित कार्यक्रम के अनुसार इस्तीफा सौंपते हैं या नहीं और विधानसभा सचिवालय इस पर क्या कदम उठाता है।
दर्पण न्यूज 24/7 की नजर: किसानों की बर्बाद फसलों का मुद्दा हो या जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक जवाबदेही—आखिरकार कसौटी जनता के हित ही हैं। उमेश कुमार के इस्तीफे की घोषणा से उठे सवालों का जवाब आने वाले घटनाक्रम से मिलेगा।
