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हरदा की ‘हरिद्वार इच्छा’ पर रंजीत के ‘हरि अनंत’ हरि कथा अनन्ता वाली प्रतिक्रिया ने बढ़ाई सियासी हलचल।

कभी हरदा के करीबी रहे रंजीत ‘सबै भूमि गोपाल की’ कहकर छोड़ गए कई सवाल!

देहरादून। सियासत में कई बार लंबी प्रतिक्रिया से ज्यादा असर कुछ शब्द छोड़ जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की 2027 में हरिद्वार से चुनाव लड़ने की इच्छा पर पूर्व विधायक रणजीत रावत की प्रतिक्रिया भी कुछ ऐसी ही रही। उन्होंने कहा—“हरि अनंत, हरि कथा अनंता।” इसके बाद जोड़ा—“सबै भूमि गोपाल की।”

शब्द छोटे थे, लेकिन उत्तराखंड कांग्रेस की मौजूदा सियासत में इनके मायने तलाशे जाने लगे हैं। क्या यह महज रंजीत रावत की चुटीली प्रतिक्रिया थी या हरदा की चुनावी इच्छा पर कोई राजनीतिक संदेश भी था? रंजीत ने खुद कहा कि कन्हैया जी को इच्छा जताने की क्या जरूरत, सभी जगह तो उन्हीं की हैं, जहां से चाहें चुनाव लड़ें।

यही व्याख्या इस टिप्पणी को सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया से थोड़ा अलग करती है। हरिद्वार से चुनाव लड़ने की हरीश रावत की इच्छा सामने आने के बाद स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि वह केवल अपनी पुरानी राजनीतिक स्मृतियों और हरिद्वार से जुड़ाव की बात कर रहे हैं या 2027 के लिए कोई राजनीतिक संभावना भी खुली रख रहे हैं। रंजीत रावत का जवाब इसी सवाल को एक अलग कोण दे जाता है।

इस टिप्पणी का संदर्भ दोनों नेताओं के पुराने रिश्तों से भी जुड़ता है। एक समय रणजीत रावत को हरीश रावत के बेहद करीबी सहयोगियों में गिना जाता था। बाद में दोनों के राजनीतिक रास्ते अलग हुए और रिश्तों में आई दूरी सार्वजनिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बदल गई। ऐसे में हरदा की ‘इच्छा’ पर रंजीत के शब्द स्वाभाविक रूप से अधिक ध्यान खींचते हैं।

खास बात यह भी है कि रंजीत ने सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि हरीश रावत को हरिद्वार से चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं लड़ना चाहिए। उन्होंने अपने जवाब को मुहावरे और धार्मिक प्रतीक के सहारे रखा। “सबै भूमि गोपाल की” कहकर उन्होंने जहां चाहें वहां से चुनाव लड़ने की बात कही। अब इस कथन को कोई सहज राजनीतिक टिप्पणी माने या उसमें व्यंग्य तलाशे, इसका अर्थ निकालना पाठक और राजनीतिक पर्यवेक्षकों पर निर्भर है।

इस बीच पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा ने रंजीत की टिप्पणी से अलग रुख अपनाते हुए कहा कि हरीश रावत कांग्रेस के लिए “फादर फिगर” हैं और जहां से भी उनकी इच्छा हो, वहां उनका सम्मान किया जाना चाहिए।

खुद हरीश रावत ने भी चुनाव लड़ने के सवाल पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं की। उन्होंने कहा कि उनकी पोस्ट हरिद्वार से जुड़ी यादों को लेकर थी और लोग उनसे प्यार करते हैं। साथ ही उन्होंने कहा, “इच्छाओं का क्या… वो तो मरते दम तक रहती हैं।” जब सीधे पूछा गया कि क्या वह हरिद्वार से चुनाव लड़ेंगे, तो उनका जवाब था—“संगठन को तय करना है।”

यानी हरदा की ओर से इच्छा का संकेत है, लेकिन अंतिम निर्णय संगठन पर छोड़ा गया है। दूसरी ओर रंजीत रावत की दो पंक्तियां—“हरि अनंत, हरि कथा अनंता” और “सबै भूमि गोपाल की”—अब कांग्रेस की 2027 वाली सियासत में चर्चा का विषय बन गई हैं।

आखिर इन शब्दों में सिर्फ रंजीत की चुटीली शैली है या हरदा की ‘हरिद्वार इच्छा’ को लेकर कोई गहरा राजनीतिक संकेत? फिलहाल इसका निश्चित जवाब सामने नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि कभी करीबी रहे दो नेताओं के बदलते राजनीतिक रिश्तों की पृष्ठभूमि में बोले गए ये शब्द साधारण प्रतिक्रिया से कहीं ज्यादा चर्चा बटोर रहे हैं। 2027 के टिकट तय होने तक शायद इन शब्दों के मायने भी धीरे-धीरे साफ होते जाएं।

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