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डीएनए रिपोर्ट ने पलट दी पिथौरागढ़ दुष्कर्म केस की कहानी! शिक्षक नहीं, दूसरे नाबालिग से मिला नवजात का डीएनए!

तीन महीने पहले शिक्षक के खिलाफ दर्ज हुआ था पॉक्सो का मुकदमा, पुलिस दाखिल कर चुकी थी आरोपपत्र; अब वैज्ञानिक जांच में सामने आया नया नाम, किशोर न्याय बोर्ड के आदेश पर बाल संप्रेक्षण गृह भेजा गया किशोर!

पिथौरागढ़। एक नाबालिग छात्रा, गर्भपात की दवा, मृत नवजात के अवशेष और फिर डीएनए जांच का चौंकाने वाला खुलासा! पिथौरागढ़ में सामने आए इस संवेदनशील प्रकरण ने पुलिस की शुरुआती जांच से लेकर कानूनी कार्रवाई तक कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस शिक्षक के खिलाफ नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, डीएनए जांच में वह नवजात का जैविक पिता नहीं निकला। इसके उलट, एक अन्य नाबालिग किशोर का डीएनए नवजात के जैविक नमूनों से मेल खा गया है।

इस खुलासे के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है। पुलिस ने 3 नवंबर को संबंधित किशोर को संरक्षण में लेकर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया। बोर्ड के आदेश पर उसे अल्मोड़ा स्थित राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह भेज दिया गया।

गर्भवती मिली दसवीं की छात्रा, गर्भपात की दवा से बिगड़ी तबीयत!

मामला जुलाई 2026 का है। जानकारी के मुताबिक, दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली नाबालिग छात्रा के गर्भवती होने का पता चलने पर परिवार में हड़कंप मच गया था। आरोप है कि छात्रा को गर्भपात की दवा दी गई। दवा खाने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसे अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। परिजन उसे तत्काल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। चिकित्सकों ने मामले की गंभीरता देखते हुए पुलिस को सूचना दी।

बाद में छात्रा ने नवजात को जन्म दिया। नवजात को जंगल में फेंके जाने की जानकारी सामने आई। पुलिस ने जंगल से उसके अवशेष बरामद कर जांच शुरू की। इसके बाद मामला सिर्फ आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई गई।

शिक्षक पर दर्ज हुआ पॉक्सो का मुकदमा, दाखिल हो चुका था आरोपपत्र!

पीड़िता के परिजनों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने स्कूल के एक शिक्षक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 65(1) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5/6 के तहत मुकदमा दर्ज किया था। पुलिस ने शुरुआती जांच के आधार पर 24 जुलाई 2026 को शिक्षक के खिलाफ न्यायालय में आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया था।

इसी बीच मृत नवजात के जैविक नमूने डीएनए परीक्षण के लिए रुद्रपुर स्थित क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजे गए। रिपोर्ट ने जांच की दिशा ही बदल दी।

डीएनए रिपोर्ट में शिक्षक से मेल नहीं, दूसरे किशोर पर पहुंची जांच!

प्रयोगशाला की रिपोर्ट में शिक्षक का डीएनए नवजात के जैविक नमूनों से मेल नहीं खाया। इसके बाद पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाते हुए दो अन्य संदिग्धों के रक्त नमूने 12 अक्टूबर को डीएनए परीक्षण के लिए भेजे।

रिपोर्ट में इनमें से एक विधि-विवादित किशोर का डीएनए नवजात के जैविक नमूनों से मेल खाने की पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस ने 3 नवंबर को उसे संरक्षण में लेकर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया। बोर्ड ने उसे अल्मोड़ा स्थित राजकीय बाल संप्रेक्षण गृह भेजने के आदेश दिए।

अब कई सवालों के जवाब तलाशेगी जांच!

डीएनए रिपोर्ट ने इस मामले में नया तथ्य जरूर सामने रखा है, लेकिन कई अहम सवाल अभी बाकी हैं। नाबालिग छात्रा के साथ वास्तव में क्या हुआ? गर्भावस्था की परिस्थितियां क्या थीं? गर्भपात की दवा किसने दी? नवजात को जंगल में फेंकने के पीछे किसकी भूमिका थी? और शुरुआती शिकायत में शिक्षक का नाम आने के बाद जांच किस आधार पर आगे बढ़ी?

इन सवालों के जवाब अब आगे की विवेचना और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएंगे। डीएनए का मेल जैविक पितृत्व से जुड़ा महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य है, लेकिन इससे अपने आप किसी अपराध में दोष सिद्ध नहीं होता।

इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यह है कि एक नाबालिग छात्रा की जिंदगी से जुड़े इतने संवेदनशील मामले में सच्चाई तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक जांच की जरूरत पड़ी। अब पुलिस की जिम्मेदारी है कि छात्रा की पहचान और गरिमा पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए हर पहलू की निष्पक्ष जांच करे और किसी भी दोषी को कानून के दायरे से बाहर न रहने दे।

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