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ज्योलिकोट में नहीं थम रहा है बीमारी का कहर, सरकारी दावों की खुली पोल!

26 वर्षीय अमन की मौत के बाद जल संस्थान की कार्यप्रणाली कटघरे में, जांच-जागरूकता के दावों के बीच बीमारी रोकने की व्यवस्था पर उठे सवाल!

नैनीताल।

ज्योलिकोट में जलजनित बीमारी के बढ़ते मामलों के बीच 26 वर्षीय अमन सोनकर की मौत ने सरकारी मशीनरी के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फर्क सामने ला दिया है। उल्टी-दस्त, बुखार और पीलिया के मामले लगातार सामने आने के बीच एक और युवा की मौत ने व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कैलाखान निवासी अमन ज्योलिकोट क्षेत्र में ठेकेदार के साथ रहकर मजदूरी करता था। परिजनों के मुताबिक रक्षाबंधन पर घर लौटने के बाद उसे बुखार हुआ। उसने ज्योलिकोट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उपचार कराया, लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। तबीयत बिगड़ती गई और आखिरकार उसकी मौत हो गई।

परिजनों का आरोप है कि अमन को समय पर समुचित उपचार नहीं मिल पाया। उसकी मौत का आधिकारिक चिकित्सकीय कारण अभी स्पष्ट होना बाकी है, लेकिन इस घटना ने बीमारी से जूझ रहे पूरे क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में जांच और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। स्वास्थ्य निगरानी का दावा भी किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जब बीमारी के मामले सामने आ चुके थे, तब उसकी रोकथाम के लिए पेयजल व्यवस्था की निगरानी कितनी प्रभावी थी?

यदि बीमारी का संबंध दूषित पेयजल से निकलता है तो जल संस्थान की कार्यप्रणाली सीधे कटघरे में खड़ी होती है। पेयजल स्रोतों की नियमित जांच, पाइपलाइनों की निगरानी, टंकियों की सफाई और जल गुणवत्ता की जांच जैसी व्यवस्थाएं महज कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए थीं।

ज्योलिकोट के लोगों को अब यह जानना है कि क्षेत्र में पेयजल के कितने नमूने लिए गए, उनकी जांच में क्या सामने आया और रिपोर्ट के आधार पर क्या कार्रवाई हुई। यदि पानी दूषित नहीं है तो बीमारी के लगातार सामने आने की वजह क्या है? और यदि पानी में गड़बड़ी पाई गई है तो उसे दूर करने के लिए स्थायी कदम क्या उठाए गए?

बीमारी सामने आने के बाद जांच और जागरूकता जरूरी है, लेकिन बीमारी की जड़ तक पहुंचकर उसे रोकना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।

अमन की मौत इसी जिम्मेदारी पर सवाल खड़ा कर रही है। 26 साल की उम्र में एक मजदूर की जिंदगी खत्म हो गई और पीछे रह गया एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब सिर्फ स्वास्थ्य विभाग नहीं, बल्कि पूरी सरकारी मशीनरी को देना होगा—

जब बीमारी फैल रही थी, तब पानी और स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी कितनी मुस्तैद थी?

ज्योलिकोट को अब दावों से ज्यादा जवाब, जांच की वास्तविक रिपोर्ट और स्थायी समाधान की जरूरत है।

उत्तराखंड