“जंगल में बाघ बेखौफ, गांव में इंसान बेसहारा: प्रशासनिक नाकामी से गई एक और जान”
“देवभूमि में मौत का सिलसिला जारी: फतेहपुर में बाघ का हमला, सिस्टम कटघरे में”!
दर्पण न्यूज 24/7
हल्द्वानी। देवभूमि उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब सिर्फ समस्या नहीं, मौत का सिलसिला बन चुका है। लामाचौड़ के फतेहपुर क्षेत्र में बाघ के हमले में 65 वर्षीय गंगा देवी की दर्दनाक मौत ने प्रशासनिक तंत्र की नींद और वन विभाग की लापरवाही को एक बार फिर बेनकाब कर दिया है। जंगल में बाघ का खूनी पंजा चला और दफ्तरों में बैठा सिस्टम खामोश तमाशबीन बना रहा।
गुरुवार सुबह करीब 11 बजे पीपल पोखरा निवासी गंगा देवी तीन अन्य महिलाओं के साथ जंगल में घास काटने गई थीं। झाड़ियों में घात लगाए बैठे बाघ ने अचानक हमला कर दिया। तीन महिलाएं जान बचाकर भाग निकलीं, लेकिन गंगा देवी को बाघ घसीटता हुआ जंगल के भीतर ले गया। करीब तीन किलोमीटर अंदर महिला का क्षत-विक्षत शव मिला। यह मंजर जिसने देखा, उसके रोंगटे खड़े हो गए।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यही जंगल पहले भी खूनी वारदातों का गवाह बन चुका है। बाघ और गुलदार के हमलों में सात लोगों की जान पहले ही जा चुकी है, फिर भी वन विभाग ने न तो इलाके को संवेदनशील घोषित किया, न सघन गश्त कराई और न ही पिंजरे लगवाए। ग्रामीणों का आरोप है कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद उनकी आवाज़ फाइलों में दबा दी गई।
घटना के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचे, आश्वासन दिए गए कि निगरानी बढ़ेगी और गश्त तेज होगी। लेकिन सवाल यह है कि हर मौत के बाद यही रस्म अदायगी क्यों? क्या हर बार एक लाश गिरने के बाद ही सिस्टम जागेगा?
ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों ने पीड़ित परिवार को तत्काल मुआवजा, क्षेत्र में सशस्त्र गश्त, पिंजरे लगाकर आदमखोर बाघ को पकड़ने और स्थायी सुरक्षा योजना लागू करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि अब भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो अगली मौत की जिम्मेदारी सीधे-सीधे प्रशासन और वन विभाग की होगी।
देवभूमि में इंसानी जानें सस्ती होती जा रही हैं और जंगल से सटा गांव मौत की दहलीज पर जीने को मजबूर है। सवाल सीधा है—क्या सिस्टम को जगाने के लिए हर बार एक और लाश जरूरी है?
