बिहार की हार से सबक ले उत्तराखंड कांग्रेस।
2027 में वही गलती न दोहराए।
दर्पण न्यूज 24*7 की विशेष रिपोर्ट।
देहरादून।
बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन पार्टी इतिहास की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुआ। टिकट बंटवारे से लेकर बूथ प्रबंधन तक, हर स्तर पर हुई चूक ने संगठन की कमजोरी को उजागर कर दिया। दलबदलुओं को प्राथमिकता देने से स्थानीय कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा और कई सीटों पर पार्टी का विरोध ही उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन गया। सोशल मीडिया पर अब भी एनडीए नेताओं की तस्वीरें रखने वाले चेहरों को टिकट थमाना कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता रहा।
चुनाव के दौरान पार्टी ने रोजगार जैसे अहम मुद्दे पर देर से फोकस किया, जबकि महिलाओं और अति पिछड़े वर्गों के बीच पैठ बनाने में वह नाकाम रही। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना ने नीतीश कुमार को महिलाओं में ऐसी पकड़ दिलाई कि महागठबंधन उसका मुकाबला नहीं कर सका। कांग्रेस का एमवाई से आगे सामाजिक आधार बढ़ाने का प्रयास भी ठंडा ही रह गया।
सबसे बड़ी कमी संगठनात्मक स्तर पर दिखी। कई इलाकों में पोलिंग एजेंट तक नहीं पहुंचे, रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए अफवाह फैलानी पड़ी और बागी नेताओं ने निर्णायक सीटों पर वोट काट दिए। गठबंधन के भीतर समन्वय की टूटन भी कई सीटें निगल गई। इन सारी कमजोरियों ने मिलकर पार्टी को 2010 के स्तर पर ला खड़ा किया, जहां महज चार सीटें और करीब आठ प्रतिशत वोट पर सिमटना पड़ा था।
नतीजे आते ही कांग्रेस में आत्ममंथन की मांग तेज हो गई। वरिष्ठ नेताओं ने खुले तौर पर माना कि संगठन की जड़ें कमजोर हैं और टिकट बंटवारे पर गंभीर समीक्षा जरूरी है। शशि थरूर से लेकर निखिल कुमार तक सबने स्वीकारा कि रणनीति, संदेश और नेतृत्व—तीनों मोर्चों पर पार्टी कमजोर पड़ी है।
उत्तराखंड कांग्रेस के लिए सीख — 2027 में बिहार की पुनरावृत्ति रोकना ही चुनौती।
बिहार का उदाहरण साफ बताता है कि सिर्फ लहर, गठबंधन या चेहरे से चुनाव नहीं जीते जाते—चुनाव जीतने की नींव बूथ, संगठन और स्थानीय विश्वसनीयता पर टिकी होती है। उत्तराखंड कांग्रेस के लिए यह समय चेतावनी की घंटी है। अगर दलबदलुओं के सहारे चुनाव लड़ा गया, अगर जमीन की नब्ज समझे बिना टिकट दिए गए, या यदि संगठन को सिर्फ रैलियों और भाषणों तक सीमित रखा गया—तो 2027 में परिणाम भी बिहार जैसा ही हो सकता है।
अब कांग्रेस को चाहिए कि वह जड़ों तक जाए, स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाए, संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दे और अभियान को आखिरी समय के बजाय अभी से व्यापक और संगठित रूप दे। उत्तराखंड में महिलाओं, युवाओं और संगठित समुदायों के भीतर पैठ बनाना पार्टी के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना बिहार में रह गया था।
बिहार की करारी हार सिर्फ एक राज्य का परिणाम नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए एक चेतावनी है—अगर संगठन कमजोर है, संदेश बिखरा है और चेहरे अविश्वसनीय हैं, तो सत्ता तक पहुंचने का रास्ता आधा ही रह जाता है।
प्रमोद बमेटा की रिपोर्ट दर्पण न्यूज 24*7
