लगातार सड़कों पर बिखरती ज़िंदगियां, आखिर जवाबदेह कौन?
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो प्रमोद बमेटा। नैनीताल!
जनपद नैनीताल में पिछले कुछ दिनों के भीतर हुई सड़क दुर्घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सड़क सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रह गई है? राष्ट्रीय राजमार्ग-109 से लेकर रामपुर रोड तक लगातार हो रहे हादसे महज संयोग नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यवस्था की नाकामी का संकेत हैं जो दुर्घटनाओं के बाद सक्रिय होती है, लेकिन उन्हें रोकने में तंत्र असफल साबित हो रहा है।
रामपुर रोड स्थित नेक्सा शोरूम के समीप ट्रक की टक्कर से पूर्व सैनिक शमशेर सिंह रौतेला की मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। इससे एक दिन पहले हल्दूचौड़ में पूर्व सैनिक हरीश चंदोला सड़क हादसे का शिकार हुए। इससे पहले गौरापड़ाव में दो युवाओं और तीनपानी फ्लाईओवर के समीप चार युवकों की मौत ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। इन घटनाओं को अलग-अलग हादसे मानकर भुलाया नहीं जा सकता। इन सबके पीछे एक समान प्रश्न है—क्या हमारी सड़कें वास्तव में सुरक्षित हैं?
हर दुर्घटना के बाद पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगालने और आरोपी वाहन की तलाश की बात करती है। परिवहन विभाग विशेष अभियान चलाने और चालान काटने का दावा करता है। प्रशासन संवेदना व्यक्त करता है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद फिर किसी घर का बेटा, पिता या भाई सड़क पर दम तोड़ देता है। यदि हर हादसे के बाद वही प्रक्रिया दोहराई जाती है और परिणाम नहीं बदलते, तो व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राष्ट्रीय राजमार्ग-109 और रामपुर रोड जैसे व्यस्त मार्गों पर भारी वाहनों की तेज रफ्तार, लापरवाह ड्राइविंग, अपर्याप्त निगरानी और यातायात अनुशासन की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। यदि दुर्घटना संभावित स्थलों की पहचान हो चुकी है तो वहां स्थायी सुरक्षा उपाय क्यों नहीं दिखाई देते? यदि ओवरस्पीड पर निगरानी है तो दुर्घटनाओं का सिलसिला क्यों नहीं थम रहा?
सड़क दुर्घटना केवल एक खबर नहीं होती। उसके साथ किसी परिवार का भविष्य भी टूट जाता है। पूर्व सैनिक शमशेर सिंह रौतेला अपने पीछे पत्नी, पढ़ाई कर रहे बेटे और बेटी को छोड़ गए। जिन चार युवकों ने तीनपानी फ्लाईओवर के पास जान गंवाई, उनके परिवारों के सपने भी उसी सड़क पर बिखर गए। ऐसे हादसे केवल आंकड़ों में दर्ज नहीं किए जा सकते।
अब समय केवल शोक संदेश जारी करने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। जिला प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को संयुक्त रूप से दुर्घटना संभावित स्थलों का वैज्ञानिक अध्ययन कर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। प्रभावी स्पीड मॉनिटरिंग, ब्लैक स्पॉट सुधार, भारी वाहनों की निगरानी, सड़क इंजीनियरिंग में सुधार और यातायात नियमों का कठोर पालन सुनिश्चित किए बिना स्थिति बदलने वाली नहीं है।
हर सड़क दुर्घटना के बाद यदि सिर्फ फाइलें आगे बढ़ें और परिवारों की अर्थियां उठती रहें, तो यह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंता का विषय है। सड़कें विकास की पहचान होती हैं, लेकिन यदि वही सड़कें लगातार लोगों की जान लेने लगें तो विकास का दावा भी अधूरा रह जाता है।
अब सरकार और जिम्मेदार विभागों को यह साबित करना होगा कि सड़क सुरक्षा उनके लिए केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन की रक्षा का संकल्प है। क्योंकि हर गुजरते दिन के साथ यह सवाल और बड़ा होता जा रहा है आखिर देवभूमि की सड़कों पर मौत का यह सिलसिला कब रुकेगा?
