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राष्ट्रीय राजमार्ग 109 के बाद आज अब रामपुर रोड बनी ‘मौत का गलियारा’  आखिर कब जागेगा सिस्टम?

रामपुर रोड पर फिर बुझा एक घर का चिराग,

प्रमोद बमेटा।
हल्दूचौड़। शुक्रवार को रामपुर रोड स्थित नेक्सा शोरूम के समीप हुए दर्दनाक सड़क हादसे में कुमाऊं रेजिमेंट से सेवानिवृत्त पूर्व सैनिक शमशेर सिंह रौतेला की मौत ने एक बार फिर पूरे जनपद नैनीताल को झकझोर दिया। लेकिन यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि उस भयावह तस्वीर का हिस्सा है जिसमें जिले की सड़कें लगातार लोगों की जान ले रही हैं।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शमशेर सिंह रौतेला का हादसा रामपुर रोड पर हुआ, जबकि पिछले सप्ताह जिन बड़े हादसों ने पूरे कुमाऊं को झकझोरा, वे राष्ट्रीय राजमार्ग 109 पर हुए थे। लेकिन सवाल सड़क का नहीं, बल्कि लगातार विफल होती सड़क सुरक्षा व्यवस्था का है।
कुछ ही दिन पहले एनएच 109 के गौरापड़ाव क्षेत्र में लालकुआं के दो होनहार युवाओं की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई। उस घटना का दर्द अभी लोगों के दिलों से उतरा भी नहीं था कि एनएच 109 पर तीनपानी फ्लाईओवर के समीप एक और भीषण हादसे में चार युवकों की जान चली गई। इन छह मौतों ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था।
अब रामपुर रोड पर पूर्व सैनिक शमशेर सिंह रौतेला की मौत और उससे एक दिन पहले एनएच 109 में ही हल्दूचौड़ में पूर्व सैनिक हरीश चंदोला की सड़क दुर्घटना में हुई मृत्यु ने यह साफ कर दिया है कि समस्या किसी एक सड़क तक सीमित नहीं है। पूरे जनपद नैनीताल में सड़क सुरक्षा व्यवस्था गंभीर सवालों के घेरे में है।
हर हादसे के बाद पुलिस फरार वाहन की तलाश, सीसीटीवी फुटेज और जांच की बात करती है। परिवहन विभाग विशेष चेकिंग अभियान और कार्रवाई के दावे करता है। लेकिन हकीकत यह है कि सड़कों पर तेज रफ्तार, लापरवाह ड्राइविंग और भारी वाहनों का आतंक कम होता दिखाई नहीं देता।
सबसे अधिक चिंता की बात एनएच  109 को लेकर है, जहां कुछ ही दिनों के भीतर कई बड़े हादसे हो चुके हैं। क्या इस राजमार्ग पर दुर्घटना संभावित स्थलों का वैज्ञानिक अध्ययन हुआ? क्या वहां गति नियंत्रण, प्रभावी निगरानी और स्थायी सुरक्षा उपाय लागू किए गए? यदि हां, तो फिर लगातार इतनी बड़ी दुर्घटनाएं क्यों हो रही हैं?
देश की सेवा कर लौटे एक पूर्व सैनिक का सड़क पर असमय निधन, दो होनहार युवाओं का भविष्य खत्म होना और चार परिवारों का एक साथ उजड़ जाना—ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि व्यवस्था की विफलता की दर्दनाक कहानी हैं।
यदि अब भी प्रशासन, पुलिस और परिवहन विभाग केवल प्रेस विज्ञप्तियों और चालान के आंकड़ों तक सीमित रहे, तो यह मानना पड़ेगा कि सड़क सुरक्षा उनके लिए प्राथमिकता नहीं है।
अब वक्त संवेदना नहीं, जवाबदेही का है। सवाल यह है कि आखिर जनपद नैनीताल की सड़कों पर मौत का यह सिलसिला कब थमेगा और कब किसी परिवार का चिराग सुरक्षित घर लौट पाएगा?

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