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लाइन में खड़ा नागरिक, कुर्सी पर बैठी सत्ता
उत्तराखंड की व्यवस्था पर एक कड़ा सवाल
— दर्पण न्यूज 24/7 | संपादक धर्मेंद्र शर्मा की कलम से
यह अब किसी प्रशासनिक भूल या अस्थायी अव्यवस्था का परिणाम नहीं लगता, बल्कि एक ऐसी सुनियोजित प्रणाली का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें नागरिक को नागरिक नहीं, बल्कि हमेशा लाइन में खड़ा रहने वाला व्यक्ति बना दिया गया है।
सुबह से शाम तक—आधार, केवाईसी, सत्यापन, अपडेट, लिंकिंग—इन अंतहीन कतारों में आदमी को इस कदर उलझा दिया गया है कि उसे यह सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती कि रोज़गार कहाँ है, महँगाई क्यों बढ़ रही है और शिक्षा–स्वास्थ्य की हालत क्यों बदतर हो चुकी है।
लाइन में खड़ा व्यक्ति न सोच पाता है, न सवाल कर पाता है।
वह अपनी बारी के नंबर में इतना उलझा रहता है कि यह समझ ही नहीं पाता कि उसकी मूलभूत ज़रूरतें—रोटी, रोज़गार, सुरक्षा और सम्मान—कब और कैसे शासन के एजेंडे से बाहर कर दी गईं।
यह व्यवस्था अब नागरिक को व्यस्त रखने की नहीं, बल्कि व्यर्थ बनाए रखने की कला बन चुकी है।
सरकार इसे “डिजिटल सुविधा” कहती है,
लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा कठोर है—
डिजिटल बहाना, भौतिक यातना।
पच्चीस साल का राज्य, पहचान सिर्फ़ कतार
उत्तराखंड राज्य बने पच्चीस वर्ष हो चुके हैं।
सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, योजनाओं और नारों के नाम बदले—लेकिन पिछले एक दशक में अगर किसी एक चीज़ ने आम उत्तराखंडी नागरिक की पहचान तय की है, तो वह है कतार।
सरकारी दफ्तर हों या बैंक, तहसील हो या नगर निगम, जन सेवा केंद्र हों या अस्पताल और स्कूल—हर जगह एक ही दृश्य है:
काग़ज़ों की फाइल थामे, धूप–बारिश–ठंड में अपनी बारी का इंतज़ार करता नागरिक।
आधार से शुरू हुई यह कतार आज राशन कार्ड, वोटर कार्ड, पेंशन, गैस कनेक्शन, बैंक खाते और छात्रवृत्ति तक फैल चुकी है।
हर योजना के साथ नया अपडेट,
हर अपडेट के साथ नई लाइन।
“सर्वर नहीं चल रहा”, “आज स्लॉट फुल है”, “कल आइए”—ये वाक्य अब प्रशासन की पहचान बन चुके हैं।
डिजिटल इंडिया से ‘कतार इंडिया’ तक
डिजिटल इंडिया का सपना उत्तराखंड आते-आते “कतार इंडिया” में तब्दील हो गया है।
ऐप पर फॉर्म भरने के बाद भी दस्तावेज़ सत्यापन, बायोमेट्रिक और भौतिक जांच के लिए लाइन अनिवार्य है।
जन सेवा केंद्र, जो सुविधा का माध्यम होने चाहिए थे, आज सफेद हाथी बनते जा रहे हैं—जहाँ सुबह टोकन मिलता है और दोपहर तक निराशा।
सबसे पीड़ादायक दृश्य सरकारी अस्पतालों और सामाजिक योजनाओं में दिखता है—
जहाँ बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएँ, बीमार बच्चे और दिव्यांग भी कतार में खड़े हैं।
यह सहायता नहीं, बल्कि अपमानजनक प्रतीक्षा है।
नागरिक का समय किसकी ज़िम्मेदारी?
सबसे बड़ा सवाल यह है—
क्या सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश की कि एक आम नागरिक अपने जीवन के कितने दिन सिर्फ़ लाइन में खड़े होकर गँवा देता है?
मज़दूर की दिहाड़ी चली जाती है,
किसान का खेत छूट जाता है,
बुजुर्ग की सेहत बिगड़ जाती है—
लेकिन व्यवस्था निर्विकार बनी रहती है।
उत्तराखंड इसलिए नहीं बना था कि यहाँ की जनता बाकी राज्यों से ज़्यादा लाइन में खड़ी रहे।
राज्य बना था सरल प्रशासन, तेज़ सेवा और नागरिक के सम्मान के लिए।
आज स्थिति यह है कि नागरिक, नागरिक नहीं रहा—वह सिर्फ़ एक आवेदक बनकर रह गया है।
यह आरोपपत्र है, किसी एक सरकार के खिलाफ नहीं
यह संपादकीय किसी एक सरकार के खिलाफ नहीं है।
यह उस पूरी प्रणाली के खिलाफ आरोपपत्र है, जिसने योजनाओं का बोझ जनता पर डाल दिया और सुविधा का नाम देकर पीड़ा को सामान्य बना दिया।
अब उत्तराखंड को
लाइन नहीं, समाधान चाहिए—
एक-बार सत्यापन,
सचमुच की डिजिटल सुविधा,
घर-घर सेवा
और सबसे ज़रूरी—नागरिक के समय और सम्मान की क़ीमत।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ़ लाइन का नहीं है,
सवाल यह है—
क्या उत्तराखंड की जनता का काम ही लाइन में खड़े रहना है?

उत्तराखंड