कालाढूंगी में फिर चुनावी संग्राम की आहट! 10 साल बाद बदले समीकरण—क्या ‘भगत फैक्टर’ फिर चलेगा या बनेगा नया राजनीतिक इतिहास?
दर्पण न्यूज 24/7 डेस्क।
वर्ष 2017 का चुनावी इतिहास कालाढूंगी विधानसभा की राजनीति को आज भी चुनौती देता नजर आता है। उस चुनाव में कांग्रेस, भाजपा और कालाढूंगी विकास मंच के बीच जबरदस्त त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था। सबसे बड़ा चौंकाने वाला प्रदर्शन महेश शर्मा का रहा, जिन्होंने 22,000 से अधिक वोट हासिल कर पूरे राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। वहीं कांग्रेस मात्र 26,000 वोटों पर सिमट गई थी, जबकि भाजपा प्रत्याशी बंशीधर भगत ने करीब 50,000 वोटों से भव्य जीत दर्ज की थी।
लेकिन अब दशक बीत चुका है… और हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
10 साल बाद बदली राजनीतिक तस्वीर।
आज महेश शर्मा भाजपा खेमे में खड़े नजर आ रहे हैं।
इधर बंशीधर भगत अपने बेटे विकास भगत के लिए टिकट की मजबूत पैरवी कर रहे हैं।
भाजपा के भीतर कई और दावेदार भी सक्रिय हैं और इस बार निर्दलीयों के भी मैदान में उतरने की संभावनाएं प्रबल हैं।
उधर कांग्रेस की तरफ से अभी तक कोई भी चेहरा स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है, जो खुद कांग्रेस की स्थिति पर सवाल खड़े करता है।
भाजपा में ही पक्ष–विपक्ष?
इस बार सबसे दिलचस्प स्थिति यह है कि मैदान में वास्तविक लड़ाई भाजपा के भीतर ही होती दिख रही है।
भाजपा के ही दिग्गज नेता, पूर्व पदाधिकारी और प्रभावशाली चेहरे टिकट की दौड़ में हैं। ऐसा लग रहा है कि विपक्ष कम और भाजपा के भीतर की खींचतान ज्यादा निर्णायक बनने वाली है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या ‘भगत फैक्टर’ रहेगा कायम?
कालाढूंगी की राजनीति वर्षों से बंशीधर भगत की पहचान और प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में बड़ा यक्ष प्रश्न यही है—
क्या पार्टी किसी और नाम पर दांव लगाएगी?
क्या भाजपा बंशीधर भगत के प्रभाव को चुनौती देने की हिम्मत जुटा पाएगी?
या फिर एक बार फिर “भाजपा मतलब भगत और भगत मतलब भाजपा” की परंपरा ही दोहराई जाएगी?
कौन टिकट पाएगा, कौन पीछे छूटेगा और क्या इस बार जनता कोई नया फैसला करेगी—यह आने वाला समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि कालाढूंगी की राजनीति एक बार फिर चर्चा के चरम पर है।
