








संघर्ष की मिट्टी से निकला नेतृत्व का सितारा: लालकुआँ में उभरता नाम — सुरेन्द्र सिंह लोटनी
दर्पण न्यूज 24/7।लालकुआं!
राजनीति की बिसात पर कभी-कभी ऐसे मोहरे उभरते हैं, जो चाल नहीं, इतिहास लिखने का माद्दा रखते हैं। नगर पंचायत लालकुआँ के अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह लोटनी आज उसी श्रेणी में गिने जा रहे हैं — संघर्ष की भट्टी में तपकर निकला हुआ एक ऐसा जनप्रतिनिधि, जिसकी पहचान पद से नहीं, सेवा से बनती है।
“जहाँ पसीने की स्याही से किस्मत लिखी जाती है,
वहीं से उठती है वो आवाज़, जो जनता की बन जाती है।”
मूल रूप से उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के मदकोट क्षेत्र स्थित वल्थी गाँव के निवासी लोटनी का जीवन किसी प्रेरक गाथा से कम नहीं। उनके पिताश्री स्वर्गीय मोहन सिंह लोटनी एक साधारण किसान थे, पर व्यक्तित्व असाधारण। सिद्धांतों की राह पर अडिग, परोपकार की भावना से ओतप्रोत और समाज में सम्मानित नाम। वर्ष 1994 में उनके निधन के बाद परिवार पर कठिन दौर आया, लेकिन आदर्शों की विरासत ने कभी हौसला टूटने नहीं दिया।
माता श्रीमती देवकी देवी ने धैर्य और त्याग की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने परिवार को बिखरने नहीं दिया। चार संतानों को संस्कारों की पूँजी देकर उन्होंने यह साबित किया कि मजबूत इरादों के आगे हालात भी घुटने टेक देते हैं।
“जिस घर में माँ हिम्मत की दीवार बन जाए,
वहाँ हर तूफान सिर झुका कर गुजर जाए।”
स्नातक उपाधि के बाद 4 मार्च 2002 को सुरेन्द्र सिंह लोटनी ने भारतीय सेना का दामन थामा। 17 वर्ष 28 दिन की गौरवपूर्ण सेवा के बाद 31 मार्च 2019 को सेवानिवृत्त हुए। सेना ने उन्हें अनुशासन, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की ऐसी सीख दी, जो आज भी उनके व्यक्तित्व की पहचान है।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने आराम नहीं, सेवा का रास्ता चुना। कोरोना काल की विभीषिका में जब लोग घरों में सिमटे थे, तब लोटनी राहत सामग्री और भोजन लेकर जरूरतमंदों के बीच खड़े दिखाई दिए।
“जो अंधेरों में दीपक बन जलता है,
वही सच्चा जननेता कहलाता है।”
वर्षों की सामाजिक सक्रियता और जनसेवा का परिणाम रहा कि जनता ने उन्हें नगर पंचायत लालकुआँ का अध्यक्ष चुना। आज वे कर्तव्यनिष्ठा और पारदर्शी कार्यशैली के लिए पहचाने जाते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में वे दावेदारी पेश करते हैं, तो लालकुआँ की राजनीति के समीकरण बदल सकते हैं। सैनिक बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण उनकी सैन्य पृष्ठभूमि उन्हें विशेष बढ़त दे सकती है। अनुशासन और राष्ट्रधर्म की भावना उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को अलग पहचान देती है।
“सफर लंबा है मगर कदम मजबूत हैं,
इरादे नेक हों तो रास्ते खुद ब खुद बनते हैं।”
विभिन्न दलों के संभावित उम्मीदवारों के बीच यदि उनका नाम आधिकारिक रूप से सामने आता है, तो कई दावेदारों के लिए यह चुनौती बन सकता है।
फिलहाल समय अपनी चाल चल रहा है, पर इतना तय है —
अगर सुरेन्द्र सिंह लोटनी 2027 के चुनावी रण में उतरते हैं,
तो मुकाबला सिर्फ चुनाव नहीं, जनभावनाओं का संग्राम होगा।
लालकुआँ की धरती पर एक सैनिक से जननेता तक का यह सफर, आने वाले समय की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
