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“कपकोट की बदहाली, लालकुआं की सियासत: जनता पूछ रही—अब भरोसा किस पर?”
दर्पण न्यूज 24/7, लालकुआं।
फाइव-जी और सैटेलाइट इंटरनेट के दावों के बीच उत्तराखंड का सुदूर कपकोट आज भी नेटवर्क संकट से जूझ रहा है। हाल ही में दर्जा राज्यमंत्री भूपेश उपाध्याय की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस हकीकत को उजागर कर दिया, जब उन्होंने खुद स्वीकार किया कि वे तीन दिन तक मोबाइल नेटवर्क से पूरी तरह कटे रहे। इस बयान के बाद अब यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि जनभावना और भरोसे की राजनीति का केंद्र बन गया है।
कपकोट, जो कभी भगत सिंह कोश्यारी की राजनीतिक कर्मभूमि रहा, आज बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस क्षेत्र ने एक बड़े नेता को ऊंचाई तक पहुंचाया, वही आज मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। नेटवर्क की समस्या सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं, बल्कि आपदा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अहम क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रही है।
अब इस पूरे घटनाक्रम का असर लालकुआं की सियासत पर साफ दिखाई देने लगा है। चर्चा तेज है कि दीपेंद्र कोश्यारी 2027 के चुनाव को देखते हुए लालकुआं से अपनी नई राजनीतिक पारी शुरू करने की तैयारी में हैं। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या जनता उन्हें सहज स्वीकार करेगी?
जनता की आवाज अब सीधी और तीखी है—
“जब कपकोट जैसे अपने गढ़ की हालत नहीं सुधर पाई, तो लालकुआं में क्या बदलाव होगा?”
लालकुआं के मतदाताओं के बीच यह धारणा तेजी से बन रही है कि अब केवल नाम और विरासत के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। लोग ठोस काम, जमीनी विकास और जवाबदेही चाहते हैं। कपकोट की बदहाली ने यह संदेश साफ कर दिया है कि विकास के दावे और हकीकत के बीच की दूरी अब छुपी नहीं रह सकती।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भूपेश उपाध्याय की पोस्ट ने अनजाने में ही सरकार के विकास मॉडल की पोल खोल दी है। यह मामला अब सिर्फ एक क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर जनता के भरोसे की परीक्षा बन चुका है।
आने वाले चुनाव में असली मुद्दा यही होगा—
क्या नेता जनता की बुनियादी समस्याओं को प्राथमिकता देंगे, या फिर सियासी समीकरण ही हावी रहेंगे?
फिलहाल, कपकोट की खामोशी और लालकुआं की हलचल मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रही है—
“विकास के वादों पर जनता कब तक भरोसा करे?”

उत्तराखंड