पुस्तकों से पहले पुल की पुकार: बच्चों की भूख हड़ताल ने खोली चुनावी वादों की पोल!
13 वर्षों से पुल की बाट जोह रहा विजयपुर, मानसून आते ही गांव बन जाता है टापू; नौनिहालों ने कहा- “हमें किताबों से पहले सुरक्षित रास्ता चाहिए”
दर्पण न्यूज 24/7 ब्यूरो!
हल्द्वानी। विकास के बड़े-बड़े दावों और चुनावी मंचों से किए जाने वाले वादों के बीच गौलापार का विजयपुर गांव आज भी एक पुल के लिए संघर्ष कर रहा है। विडंबना यह है कि जिस पुल का शिलान्यास वर्ष 2013 में हो चुका था, वह आज तक धरातल पर नहीं उतर पाया। नतीजा यह है कि हर मानसून में 650 आबादी वाला यह गांव दुनिया से कट जाता है और सबसे अधिक परेशानी उन बच्चों को उठानी पड़ती है जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए, लेकिन वे अपने भविष्य के लिए भूख हड़ताल पर बैठने को मजबूर हैं।
सोमवार को हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में विजयपुर गांव के बुजुर्ग, महिलाएं, युवा और स्कूली बच्चे अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। नौ घंटे से अधिक चले इस आंदोलन ने एक बार फिर उन चुनावी वादों की हकीकत उजागर कर दी, जिनमें वर्षों से गांव को पुल का सपना दिखाया जाता रहा है।
आंदोलन का सबसे मार्मिक पक्ष बच्चों की आवाज रही। सातवीं कक्षा की छात्रा हिमानी अधरिया ने कहा कि बारिश के दिनों में नदी में पानी आने पर वे कई-कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाते। नौवीं की छात्रा कोमल पलड़िया ने बताया कि कई बार बच्चे नदी के बीच में फंस जाते हैं और ग्रामीणों की मदद से किसी तरह घर पहुंचते हैं। दसवीं की छात्रा नेहा सम्भल ने सवाल उठाया कि एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई, पुरानी पीढ़ी बूढ़ी हो गई, लेकिन पुल आज भी सपना बना हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटाए, धरने दिए, ज्ञापन सौंपे, लेकिन समाधान नहीं मिला। अब जब बच्चे खुद सड़कों पर उतर आए हैं तो यह केवल पुल की मांग नहीं, बल्कि व्यवस्था से जवाब मांगने की लड़ाई बन गई है।
शाम को एसडीएम और लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों द्वारा लिखित आश्वासन दिए जाने के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया गया। वहीं सांसद अजय भट्ट ने भी पुल निर्माण के लिए 3.87 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिलने और जल्द कार्य शुरू होने की बात कही है। लेकिन वर्षों से केवल आश्वासनों का इतिहास देख चुके ग्रामीण अब वादों पर नहीं, जमीन पर काम देखना चाहते हैं।
विजयपुर की यह कहानी केवल एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि उन तमाम ग्रामीण क्षेत्रों की पीड़ा है जहां चुनाव के समय विकास के सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाएं वर्षों तक फाइलों में कैद रहती हैं। आज जब बच्चे “पुस्तकों से पहले पुल” की मांग कर रहे हैं, तो यह केवल एक नारा नहीं बल्कि व्यवस्था के लिए एक गंभीर प्रश्न है—आखिर विकास की राह में इन मासूमों को और कितने साल इंतजार करना होगा?
