25 साल बाद भी अधूरे सपने: देवभूमि की आत्मा पर उठते सवाल!
पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत की पीड़ा: “क्या इसी उत्तराखंड के लिए शहादतें दी गई थीं?”
प्रमोद बमेटा दर्पण न्यूज़ 24/7 ब्यूरो
9 नवंबर 2026 को उत्तराखंड अपनी स्थापना के 26वें वर्ष में प्रवेश करेगा। पूर्ववर्ती वर्षों की भांति सरकारी मंचों पर उपलब्धियों के दावे होंगे, विकास की गाथाएं सुनाई जाएंगी और राज्य आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी। लेकिन इन तमाम उत्सवों और घोषणाओं के बीच एक सवाल आज भी पहाड़ों की वादियों में गूंज रहा है—क्या यह वही उत्तराखंड है जिसकी कल्पना राज्य आंदोलन के दौरान की गई थी?
इस सवाल को और भी गंभीर बना देते हैं राज्य आंदोलन के सक्रिय सहभागी, पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता तीरथ सिंह रावत के वे शब्द, जिनमें एक आंदोलनकारी की पीड़ा, एक जनप्रतिनिधि की चिंता और एक उत्तराखंडी का दर्द साफ झलकता है।
तीरथ सिंह रावत कहते हैं कि उत्तराखंड इसलिए नहीं बनाया गया था कि यहां का नौजवान नशे की गिरफ्त में अपनी जिंदगी बर्बाद कर दे, किसान अपनी ही जमीन पर उपेक्षित महसूस करे और समाज भय तथा असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर हो जाए। उनका मानना है कि राज्य गठन का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं और देवभूमि की पहचान की रक्षा करना था।
कभी अपनी आध्यात्मिक विरासत, सरल जीवनशैली और सामाजिक सौहार्द के लिए देश-दुनिया में सम्मान पाने वाला उत्तराखंड आज कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। बढ़ता नशा, लगातार बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं, सामाजिक अव्यवस्था और अपराध की घटनाएं चिंता का विषय बन चुकी हैं। सबसे अधिक चिंता उस युवा पीढ़ी को लेकर है, जिसे राज्य का भविष्य माना जाता था।
पूर्व मुख्यमंत्री का कहना है कि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को बर्बाद कर देता है। शुरुआत में युवाओं को लालच और बहकावे से इसकी ओर धकेला जाता है, लेकिन अंततः इसकी कीमत पूरा परिवार चुकाता है। यह स्थिति उस राज्य के लिए बेहद चिंताजनक है, जिसकी पहचान कभी अनुशासन, संस्कार और सामाजिक चेतना से होती थी।
उन्होंने महिलाओं और युवतियों की सुरक्षा पर भी गंभीर चिंता जताई। उनका कहना है कि आज समाज में ऐसा वातावरण बनता जा रहा है, जहां लोग घर से निकलते समय भी आशंकित रहते हैं। यह स्थिति उत्तराखंड की उस सांस्कृतिक विरासत के बिल्कुल विपरीत है, जिस पर यहां के लोग गर्व करते आए हैं।
हालांकि तीरथ सिंह रावत केवल सरकार और प्रशासन को कटघरे में खड़ा नहीं करते। वे जनता और समाज की भी समान जिम्मेदारी तय करते हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि जनता गलत नेतृत्व का चुनाव करती है और बाद में उसी व्यवस्था पर सवाल उठाती है, तो आत्ममंथन की आवश्यकता दोनों पक्षों को है।
उनका संदेश विशेष रूप से युवाओं के लिए है। वे कहते हैं कि उत्तराखंड का भविष्य किसी सरकार या नेता के हाथों में नहीं, बल्कि प्रदेश के युवाओं की सोच, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी में निहित है। यदि युवा जागरूक होंगे, नशे से दूर रहेंगे और समाज निर्माण में अपनी भूमिका निभाएंगे, तभी राज्य आंदोलन के सपनों को वास्तविकता में बदला जा सकेगा।
उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के उपरांत राज्य की सत्ता में काबिज पार्टी के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उन हजारों आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों का आईना है जिन्होंने अलग राज्य के लिए संघर्ष किया था। सवाल आज भी वही है—क्या हम उस उत्तराखंड की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी कल्पना शहीदों ने की थी, या फिर देवभूमि की आत्मा धीरे-धीरे अपने मूल स्वरूप से दूर होती जा रही है?
26वे राज्य स्थापना दिवस के जश्न से पहले यह आत्ममंथन जरूरी है, क्योंकि इतिहास केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन सपनों से भी बनता है जिन्हें पूरा करने का संकल्प लिया गया था।
