विदाई की सलामी में झुक गया इंसान, आंखों में छलक आई जंगल की संवेदना!
सेवानिवृत्ति पर 60 वर्षीय वन दरोगा हथिनी मालिनी के पैरों में झुके, फिर गले लगकर फूट-फूटकर रो पड़े!
नौ माह की हथिनी से बिछड़ने का दर्द देख नम हुईं सैकड़ों आंखें, कालागढ़ एलीफेंट कैंप बना भावनाओं का साक्षी!
करन तिवारी, संवाददाता
दर्पण न्यूज 24×7, रामनगर
सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्ति के दृश्य अक्सर फूल-मालाओं, तालियों और सम्मान तक सीमित रहते हैं, लेकिन कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ एलीफेंट कैंप में सोमवार को जो दृश्य सामने आया, उसने यह साबित कर दिया कि संवेदनाओं की कोई भाषा नहीं होती। यहां एक 60 वर्षीय वन दरोगा अपनी विदाई के समय किसी अधिकारी या सहकर्मी से नहीं, बल्कि नौ माह की हथिनी मालिनी से बिछड़ने के दर्द में फूट-फूटकर रो पड़ा।
सेवा के अंतिम दिन वन दरोगा भारत सिंह रावत सबसे पहले मालिनी के पास पहुंचे। उन्होंने उसके पैरों को श्रद्धा से छुआ, फिर उसे गले से लगा लिया। अगले ही पल उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। वर्षों की कठोर वन सेवा करने वाला यह कर्मयोगी उस मासूम हथिनी से बिछड़ने का दर्द सहन नहीं कर पाया। वहां मौजूद अधिकारी, महावत, कर्मचारी और ग्रामीण भी इस दृश्य को देखकर खुद को रोक नहीं सके। कुछ पल के लिए पूरा एलीफेंट कैंप मौन हो गया।
यह रिश्ता किसी वनकर्मी और वन्यजीव का नहीं था, बल्कि एक पिता और बेटी जैसा था।
करीब दस महीने पहले 4 सितंबर 2025 को कोटद्वार की मालन नदी से 15 से 20 दिन की एक बेहद कमजोर और मरणासन्न हथिनी का शावक रेस्क्यू कर कालागढ़ लाया गया था। नदी के नाम पर उसका नाम मालिनी रखा गया। 19 फरवरी 2026 को वन मंत्री सुबोध उनियाल की मौजूदगी में उसका विधिवत नामकरण हुआ।
उस दिन से भारत सिंह रावत ने मालिनी को अपनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपना परिवार मान लिया। समय पर दूध पिलाना, दवाइयां देना, रात-दिन निगरानी रखना, उसके स्वास्थ्य की चिंता करना—यह सब उनकी दिनचर्या बन गया। उन्होंने कैंप के हर कर्मचारी को साफ निर्देश दिए कि मालिनी की देखभाल में किसी तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं होगी।
वन क्षेत्राधिकारी नंद किशोर रुबाली के सहयोग और पशु चिकित्सक डा. दुष्यंत कुमार शर्मा की नियमित चिकित्सा निगरानी में मालिनी की सेहत लगातार सुधरती गई। जब वह कैंप में आई थी, तब उसका वजन महज 85 किलोग्राम था। आज वह लगभग 280 किलोग्राम की स्वस्थ और चंचल हथिनी बन चुकी है। यह बदलाव केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि एक वनकर्मी के अथक प्रेम, समर्पण और ममता का परिणाम है।
विदाई समारोह में अधिकारियों ने भारत सिंह रावत के सेवाकाल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने जंगल और वन्यजीवों की रक्षा को कभी नौकरी नहीं माना, बल्कि जीवन का धर्म समझकर निभाया। उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा रहेगा।
कार्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डा. साकेत बडोला ने कहा कि दूरस्थ जंगलों में काम करने वाले वनकर्मी केवल वन्यजीवों की सुरक्षा नहीं करते, बल्कि उनके साथ एक गहरा भावनात्मक रिश्ता भी बना लेते हैं। जब कोई घायल या असहाय वन्यजीव उनकी देखरेख में स्वस्थ होकर बड़ा होता है, तो उससे उनका जुड़ाव परिवार जैसा हो जाता है। ऐसे में सेवानिवृत्ति या स्थानांतरण के समय बिछड़ने का दर्द स्वाभाविक है।
आज कालागढ़ एलीफेंट कैंप में गजराज, लक्षमा, सावन और मालिनी सहित चार हाथी हैं। भारत सिंह रावत की सेवानिवृत्ति के बाद अब कैंप की जिम्मेदारी रक्षित पांडेय संभालेंगे, लेकिन मालिनी के साथ उनके स्नेह का अध्याय हमेशा याद किया जाएगा।
यह केवल एक वन दरोगा की विदाई नहीं थी। यह उस रिश्ते की कहानी थी, जहां इंसान और वन्यजीव के बीच प्रेम, विश्वास और करुणा ने शब्दों की जरूरत ही खत्म कर दी। कालागढ़ के जंगलों में बहते आंसुओं ने यह संदेश दे दिया कि प्रेम की भाषा इंसान ही नहीं, प्रकृति और वन्यजीव भी बखूबी समझते हैं।
