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प्रवेश द्वार से पहले खुला ‘श्रेय द्वार’, रुद्रपुर में भाजपा के दो चेहरे आमने-सामने

रुद्रपुर। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि विकास कार्य जितना बड़ा होता है, उसका श्रेय लेने की होड़ भी उतनी ही तेज हो जाती है। रुद्रपुर में प्रस्तावित भव्य प्रवेश द्वार ने इसी कहावत को एक बार फिर सच साबित कर दिया है। अभी प्रवेश द्वार की नींव भी नहीं पड़ी है, लेकिन उसके राजनीतिक स्वामित्व को लेकर भाजपा के दो बड़े जनप्रतिनिधि आमने-सामने आ गए हैं। एक ओर विधायक शिव अरोरा हैं, जो इसे अपनी पहल का परिणाम बता रहे हैं, तो दूसरी ओर महापौर विकास शर्मा हैं, जिनका दावा है कि यह नगर निगम के प्रयासों का नतीजा है। दिलचस्प यह है कि दोनों ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आभार जता रहे हैं, लेकिन जनता के बीच संदेश यही देने की कोशिश कर रहे हैं कि इस उपलब्धि के असली सूत्रधार वही हैं।

विधायक शिव अरोरा ने पत्रकार वार्ता कर दस्तावेजों के साथ दावा किया कि उन्होंने 20 फरवरी 2023 को मुख्यमंत्री को रुद्रपुर की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान को दर्शाने वाले भव्य प्रवेश द्वार का प्रस्ताव सौंपा था। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव को 17 मई 2023 की घोषणा में शामिल किया और बाद में जिला विकास प्राधिकरण को इसकी डीपीआर तैयार करने के निर्देश दिए गए। विधायक के मुताबिक यह परियोजना उनके लगातार प्रयासों का प्रतिफल है, जो अब धरातल पर उतरने जा रही है।

उधर, महापौर विकास शर्मा ने भी इस परियोजना को अपनी पहल का परिणाम बताते हुए कहा कि नगर निगम ने काफी पहले इसका प्रस्ताव शासन को भेज दिया था। उनका कहना है कि कार्यभार संभालने के बाद से ही रुद्रपुर को उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान के अनुरूप विकसित करने का संकल्प लिया गया था। त्रिशूल चौक के निर्माण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अब लगभग ढाई करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह प्रवेश द्वार भी उसी सोच की अगली कड़ी है।

राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि आखिर इस परियोजना का वास्तविक श्रेय किसे मिलेगा। विकास कार्यों को लेकर दावेदारी कोई नई बात नहीं है, लेकिन भाजपा के भीतर इस तरह खुले तौर पर श्रेय की प्रतिस्पर्धा अब चर्चा का विषय बनती जा रही है। विपक्ष भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है और इसे भाजपा की अंदरूनी खींचतान से जोड़कर देख रहा है।

दरअसल, यह पहला मौका नहीं है जब किसी विकास परियोजना को लेकर श्रेय की राजनीति सामने आई हो। कुछ समय पहले लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग के ओवर फुट ब्रिज, सड़कों के पेंचवर्क और अन्य विकास कार्यों को लेकर भी इसी तरह की बयानबाजी ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं। अब वही तस्वीर रुद्रपुर में भी दिखाई देने लगी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा एक भव्य प्रवेश द्वार का है, जिसने निर्माण से पहले ही राजनीतिक गलियारों में अपनी अलग पहचान बना ली है।

सोशल मीडिया पर भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर व्यंग्य और कटाक्षों की बाढ़ आ गई है। कोई लिख रहा है कि “प्रवेश द्वार बाद में बनेगा, श्रेय का द्वार पहले खुल गया”, तो कोई कह रहा है कि “उत्तराखंड में अब विकास कार्यों से ज्यादा उनकी क्रेडिट लाइन लंबी होती जा रही है।”

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम सवाल जनता का है। आम लोगों को इस बात से बहुत फर्क नहीं पड़ता कि प्रस्ताव किसने भेजा, पत्र किसने लिखा या घोषणा किसके आग्रह पर हुई। उनके लिए मायने सिर्फ इतना रखते हैं कि परियोजना समय पर पूरी हो, गुणवत्ता के साथ बने और शहर की पहचान बने। लेकिन जिस तरह विकास कार्यों से पहले श्रेय की राजनीति सुर्खियां बटोर रही है, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब विकास से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका राजनीतिक स्वामित्व हो गया है? यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में हर परियोजना के साथ शिलान्यास पट्टिका से पहले शायद “श्रेय पट्टिका” लगाने की भी मांग उठने लगे, ताकि जनता को पहले से पता रहे कि तालियां आखिर किसके हिस्से में जानी हैं।

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