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आखिर कब पहाड़ के काम आएगा पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी?
प्रमोद बमेटा ब्यूरो दर्पण न्यूज 24/7!
9 नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड देश का 27वां राज्य बना, तब पहाड़ के लोगों की आंखों में एक सपना था क्या अब विकास की धारा गांव-गांव तक पहुंचेगी? क्या पहाड़ का पानी पहाड़ के काम आएगा? क्या पहाड़ की जवानी अपने ही घर-आंगन में भविष्य तलाश पाएगी? अलग राज्य की मांग केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं थी, बल्कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की उस लड़ाई का परिणाम थी, जिसके लिए आंदोलनकारियों ने वर्षों तक संघर्ष किया और अनेक लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
आज राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने को हैं। इस दौरान उत्तराखंड ने नित्यानंद स्वामी से लेकर पुष्कर सिंह धामी तक कई मुख्यमंत्रियों का दौर देखा। हर सरकार अपने साथ विकास के नए वादे और नई प्राथमिकताएं लेकर आई। कहीं सड़कें बनीं, कहीं पुल बने, चारधाम यात्रा का विस्तार हुआ, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रयास हुए, उद्योग और निवेश की बातें हुईं, डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ। उपलब्धियों की यह सूची छोटी नहीं है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वहीं खड़ा है, क्या इन उपलब्धियों का लाभ पहाड़ के अंतिम गांव तक पहुंच पाया? क्या पलायन रुका? क्या गांव आबाद हुए? क्या खेतों में फिर से हल चलने लगे? क्या युवाओं को अपने ही प्रदेश में सम्मानजनक रोजगार मिला?
राज्य आंदोलन का सबसे लोकप्रिय नारा था “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम आए।” यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य का विजन था। 26 वर्षों बाद भी यह प्रश्न अनुत्तरित दिखाई देता है कि आखिर यह सपना कब साकार होगा?
आज उत्तराखंड के अनेक गांव खाली हो रहे हैं। स्कूलों में बच्चों की संख्या घट रही है, खेती बंजर होती जा रही है और युवा रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। सड़कें तो कई गांवों तक पहुंचीं, लेकिन कई गांवों से लोग ही चले गए। योजनाएं बनीं, बजट खर्च हुए, लेकिन स्थायी आजीविका का संकट अभी भी बना हुआ है।
विकास केवल भवन, सड़क और परियोजनाओं का नाम नहीं होता। विकास तब माना जाएगा जब गांव में रहने वाला युवा अपने घर पर सम्मानपूर्वक रोजगार पा सके, किसान अपनी खेती से खुशहाल जीवन जी सके, महिलाओं को सुविधाएं मिलें और बुजुर्गों को अपने बच्चों के पलायन का दर्द न झेलना पड़े।
एक और चिंता का विषय यह है कि उत्तराखंड की आध्यात्मिक पहचान भी समय के साथ नई चुनौतियों का सामना कर रही है। राज्य के अनेक प्रसिद्ध तीर्थस्थल अब बड़े पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित हो रहे हैं। धार्मिक पर्यटन से आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं, लेकिन इसके साथ यह अपेक्षा भी है कि इन स्थलों की आध्यात्मिक गरिमा, पारदर्शिता और व्यवस्थाएं पूरी निष्ठा से सुरक्षित रहें। हाल के वर्षों में मंदिरों की व्यवस्थाओं और चढ़ावे से जुड़े विवादों ने भी लोगों के बीच सवाल खड़े किए हैं। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही आवश्यक है ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास अक्षुण्ण बना रहे।
इसी तरह समाज में शराब की बढ़ती उपलब्धता और उससे जुड़ी सामाजिक चिंताओं पर भी समय-समय पर बहस होती रही है। अनेक लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या विकास का अर्थ केवल राजस्व बढ़ाना है, या ऐसी नीतियां बनाना भी है जो समाज के स्वास्थ्य, परिवार और युवा पीढ़ी के भविष्य को मजबूत करें?
यही वह बिंदु है जहां उत्तराखंड का मूल सपना फिर याद आता है। क्या पृथक राज्य आंदोलन में अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों ने ऐसे उत्तराखंड की कल्पना की थी, जहां पलायन आज भी सबसे बड़ी समस्या बना रहे, गांव खाली होते जाएं और विकास का लाभ समान रूप से हर क्षेत्र तक न पहुंचे? यह प्रश्न किसी एक सरकार से नहीं, बल्कि पूरे समाज और सभी राजनीतिक दलों से है।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी पूंजी उसके जल स्रोत, जंगल, जैव विविधता, संस्कृति, कृषि, बागवानी, पर्यटन और मेहनती युवा हैं। यदि इन संसाधनों को स्थानीय रोजगार, उद्यमिता, शिक्षा और आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए तो उत्तराखंड आत्मनिर्भरता की नई मिसाल बन सकता है।
अब समय केवल नई घोषणाओं का नहीं, बल्कि परिणामों का है। ऐसी विकास नीति की आवश्यकता है जिसमें सड़क के साथ रोजगार हो, पर्यटन के साथ स्थानीय आय हो, शिक्षा के साथ कौशल हो, स्वास्थ्य के साथ सुलभ सेवाएं हों और योजनाओं के साथ ठोस परिणाम भी दिखाई दें।
उत्तराखंड की 26 वर्षों की यात्रा उपलब्धियों और अधूरे सपनों दोनों की कहानी है। राज्य बनना मंजिल नहीं था, बल्कि एक नई शुरुआत थी। अब आवश्यकता है कि राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्यों को फिर से केंद्र में रखा जाए। जिस दिन पहाड़ का पानी वास्तव में पहाड़ के खेतों, गांवों और उद्योगों को समृद्ध करेगा और पहाड़ की जवानी अपने ही प्रदेश में सम्मानजनक भविष्य पाएगी, उसी दिन उत्तराखंड राज्य आंदोलन का सपना सही मायनों में पूरा माना जाएगा।
आज भी उत्तराखंड की जनता इसी उम्मीद के साथ भविष्य की ओर देख रही है कि आने वाले वर्षों में यह प्रदेश केवल योजनाओं का नहीं, बल्कि परिणामों का राज्य बनेगा जहां सचमुच पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम आएगी।

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