








कुंजवाल के यूकेडी में जाने से गरमाई सियासत, क्या उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की आहट?
26 साल बाद भाजपा-कांग्रेस के सामने सवाल,जनता फिर क्षेत्रीय ताकत पर लगाएगी भरोसा? ढाई सौ से अधिक लोगों के यूकेडी में शामिल होने से बढ़ी राजनीतिक हलचल!
दर्पण न्यूज 24/7 संवाददाता
अल्मोड़ा।
उत्तराखंड राज्य गठन को 26 वर्ष पूरे होने को हैं। इन वर्षों में प्रदेश की सत्ता बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस के हाथों में रही, लेकिन रोजगार, पलायन, पहाड़ों में मूलभूत सुविधाओं की कमी, स्थानीय युवाओं के लिए अवसर और जल-जंगल-जमीन से जुड़े सवाल आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। ऐसे समय में जागेश्वर विधानसभा क्षेत्र से पूर्व दर्जा राज्यमंत्री दिनेश सिंह कुंजवाल का कांग्रेस छोड़कर उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) में शामिल होना महज एक राजनीतिक दल-बदल नहीं, बल्कि प्रदेश की सियासत में तीसरे विकल्प की संभावनाओं को टटोलने वाली घटना के रूप में देखा जा रहा है।
अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर जैंती में आयोजित कार्यक्रम में दिनेश कुंजवाल ने सैकड़ों समर्थकों के साथ यूकेडी की सदस्यता ग्रहण की। उनके साथ भाजपा और कांग्रेस से जुड़े बताए जा रहे ढाई सौ से अधिक लोगों के यूकेडी में शामिल होने का दावा किया गया। जागेश्वर जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में हुए इस घटनाक्रम ने आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
कुंजवाल का कदम कांग्रेस के लिए झटका या बड़े बदलाव का संकेत?
दिनेश सिंह कुंजवाल कांग्रेस के पुराने चेहरों में रहे हैं। वह वर्ष 2002 से 2007 तक कांग्रेस के प्रदेश मुख्य प्रवक्ता तथा वर्ष 2014 में आपदा प्रबंधन के दर्जा राज्यमंत्री रह चुके हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और पांच बार विधायक रहे गोविंद सिंह कुंजवाल के भतीजे होने के कारण भी उनका राजनीतिक प्रभाव जागेश्वर क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जाता है।
यूकेडी में शामिल होने के बाद दिनेश कुंजवाल ने रोजगार, पलायन, मूलभूत सुविधाओं और पहाड़ के संसाधनों के सवाल उठाते हुए कहा कि उत्तराखंड के संसाधनों का लाभ यहां की जनता को मिलना चाहिए। उन्होंने गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग भी दोहराई।
हालांकि, उन्होंने अपने चाचा गोविंद सिंह कुंजवाल पर विधायक निधि के दुरुपयोग के आरोप भी लगाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक रूप से इन बयानों ने जागेश्वर की सियासत को और गर्म कर दिया है।
भाजपा-कांग्रेस के लिए चेतावनी की घंटी?
उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता परिवर्तन के चक्र में घूमती रही है। क्षेत्रीय मुद्दों पर मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा करने के उद्देश्य से गठित यूकेडी राज्य आंदोलन के दौर में एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा था, लेकिन राज्य गठन के बाद वह अपनी राजनीतिक जमीन को व्यापक स्तर पर मजबूत नहीं कर सका।
अब सवाल यह है कि क्या बदली हुई परिस्थितियों में उत्तराखंड की जनता फिर किसी क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प की ओर देख रही है?
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, पहाड़ में लगातार बढ़ता पलायन, रोजगार के सीमित अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की चुनौतियां तथा जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े सवालों को लेकर युवाओं और आम लोगों में असंतोष दिखाई देता है। ऐसे मुद्दों को यदि कोई क्षेत्रीय दल प्रभावी ढंग से राजनीतिक आंदोलन में बदलने में सफल रहा तो आगामी चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है।
क्या यूकेडी बन पाएगा तीसरा विकल्प?
यूकेडी के संस्थापक सदस्य काशी सिंह ऐरी ने दावा किया कि प्रदेश में यूकेडी के पक्ष में माहौल बन रहा है और 2027 में पार्टी सरकार बनाएगी। प्रदेश अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने भी पहाड़ की जनता के बदलाव की इच्छा का दावा किया। यूथ यूकेडी के आशुतोष नेगी ने भाजपा और कांग्रेस दोनों पर निशाना साधते हुए क्षेत्रीय विकल्प को मजबूत करने की बात कही।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कुछ प्रमुख चेहरों की यूकेडी में वापसी और सदस्यता अभियान को व्यापक जनसमर्थन में बदला जा सकेगा?
क्योंकि तीसरा विकल्प बनने के लिए केवल भाजपा-कांग्रेस से नाराज नेताओं का एक मंच पर आना पर्याप्त नहीं होगा। यूकेडी को बूथ स्तर तक मजबूत संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, युवा मतदाताओं से जुड़ाव और प्रदेश के ज्वलंत सवालों पर लगातार आंदोलन खड़ा करने की चुनौती का सामना करना होगा।
26 साल बाद फिर वही सवाल—किसके लिए बना था उत्तराखंड?
राज्य आंदोलन के दौरान जिन सपनों के साथ उत्तराखंड की मांग उठी थी, उनमें रोजगार, पलायन पर रोक, पहाड़ के संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार और गांवों तक विकास की पहुंच प्रमुख थे। राज्य गठन के 26 साल बाद भी यही सवाल चुनावी राजनीति में बार-बार लौटते हैं।
भाजपा और कांग्रेस दोनों को अब यह समझना होगा कि केवल सत्ता परिवर्तन की राजनीति से जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं होंगी। यदि मतदाता विकास, रोजगार, पलायन और स्थानीय पहचान जैसे मुद्दों पर विकल्प तलाशने लगा तो इसका सीधा असर दोनों राष्ट्रीय दलों की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है।
जागेश्वर से उठी चिंगारी, क्या पूरे प्रदेश में बनेगी लहर?
दिनेश कुंजवाल के यूकेडी में शामिल होने और ढाई सौ से अधिक लोगों के दल में आने के दावे ने फिलहाल जागेश्वर की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह घटनाक्रम केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहता है या प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी क्षेत्रीय राजनीति को नई ऊर्जा मिलती है।
2027 का चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहेगा—या फिर उत्तराखंड की जनता एक बार फिर दो प्रमुख दलों के बीच ही अपना विकल्प चुनेगी?
यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले महीनों में उत्तराखंड की सियासत की दिशा तय करेगा। क्या उत्तराखंड क्रांति दल तीसरा विकल्प बन पाएगा या तीसरे विकल्प की तलाश फिर अधूरी रह जाएगी—इसका फैसला जनता करेगी।
