








मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र खटीमा में कच्ची शराब का कहर!
जंगलों में धधकती भट्टियां, गांवों में खुलेआम कारोबार और अब उजड़ते परिवार… मासूमों से छिना पिता का साया।
दर्पण न्यूज 24/7 संवाददाता खटीमा।
जिस खटीमा को प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह क्षेत्र के रूप में पहचान मिली है, उसी खटीमा के ग्रामीण इलाकों में कच्ची शराब का कथित कारोबार अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जंगलों और नदी-नालों की आड़ में चलने वाली अवैध शराब की भट्टियों की चर्चाएं लंबे समय से होती रही हैं, लेकिन अब इसका सबसे दर्दनाक चेहरा उन परिवारों में दिखाई दे रहा है, जिनकी खुशियां शराब की लत ने छीन लीं।
बिगराबाग में मुरादाबाद निवासी विवेक चौहान की मौत ने इस समस्या की भयावह तस्वीर सामने ला दी है। पोस्टमार्टम हाउस में पिता के शव के पास बैठे उसके दो मासूम बच्चे शायद अभी यह समझ भी नहीं पा रहे थे कि जिस पिता के सहारे उनका बचपन सुरक्षित था, वह अब कभी लौटकर नहीं आएगा।
परिजनों के मुताबिक, विवेक पिछले करीब छह माह से शराब की लत से जूझ रहा था और परिवार से अलग रहकर होटल व अन्य स्थानों पर काम करता था। रोज की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था। आखिरकार उसकी मौत ने पत्नी सरस्वती और दोनों बच्चों के सामने जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।
सरस्वती पहले से ही मेहनत-मजदूरी और पशुपालन के सहारे परिवार का खर्च चला रही थीं। बेटा विवेक चौहान शिक्षा भारती में पढ़ता है, जबकि बेटी मानवी कक्षा चार की छात्रा है। पिता की मौत के बाद अब इन दोनों मासूमों की पढ़ाई और भविष्य की जिम्मेदारी भी मां के कंधों पर आ गई है।
विवेक की मौत को महज एक व्यक्ति की शराब की लत का परिणाम मानकर नजरअंदाज करना शायद इस पूरे संकट की गंभीरता को कम करके आंकना होगा। सवाल यह है कि कच्ची शराब आखिर इतनी आसानी से लोगों तक पहुंच कैसे रही है?
स्थानीय स्तर पर आरोप लगते रहे हैं कि खटीमा के आलावर्दी, वनगवां, प्रतापपुर, आइसताबी, झनकट, नानकमत्ता, मझोला समेत कई इलाकों में कच्ची शराब बनाने और बेचने का कारोबार चल रहा है। जंगल, नदी-नालों और सुनसान इलाकों को अवैध शराब बनाने वालों के लिए मुफीद बताया जाता है।
जब किसी क्षेत्र में अवैध शराब के कारोबार की शिकायतें लगातार सामने आती हैं तो सबसे बड़ा सवाल निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था पर उठता है। स्थानीय लोगों द्वारा आबकारी विभाग की कथित मिलीभगत के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
लेकिन सवाल गंभीर है—अगर अवैध शराब का कारोबार इतना व्यापक है तो जिम्मेदार विभागों की नजर आखिर कहां है?
छापेमारी होती है, भट्टियां पकड़े जाने की खबरें आती हैं, कुछ गिरफ्तारियां भी होती हैं, लेकिन कुछ समय बाद वही कारोबार फिर शुरू होने की शिकायतें क्यों सामने आती हैं?
पोस्टमार्टम हाउस में पिता के शव के पास बैठे विवेक के बच्चों का दृश्य खटीमा के लिए एक आईना है।
एक तरफ शराब से होने वाले राजस्व की चर्चा होती है, दूसरी तरफ नशे की गिरफ्त में फंसकर टूटते परिवारों की कहानी है। किसी घर में पति शराब का शिकार बनता है तो पीछे पत्नी और बच्चे आर्थिक संकट से जूझते हैं। कहीं बच्चों की पढ़ाई छूटती है तो कहीं परिवार कर्ज में डूब जाता है।
विवेक की मौत के बाद दो मासूमों के सिर से पिता का साया उठ गया। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि विवेक की मौत कैसे हुई—सवाल यह भी है कि ऐसी मौतों को रोकने के लिए व्यवस्था कब जागेगी?
मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र खटीमा में अगर कच्ची शराब का कथित नेटवर्क इतना मजबूत है कि जंगलों और गांवों के बीच इसका कारोबार फलने-फूलने की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती भी है।
जरूरत सिर्फ छिटपुट कार्रवाई की नहीं, बल्कि अवैध शराब के स्रोत, निर्माण स्थलों, सप्लाई चैन और बिक्री केंद्रों की पहचान कर जिम्मेदारी तय करने वाली व्यापक कार्रवाई की है।
खटीमा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का गृह क्षेत्र है। ऐसे में यहां की छोटी से छोटी समस्या भी प्रदेश की व्यवस्था के लिए संदेश बन जाती है।
अगर यहां अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई प्रभावी है तो उसका असर जमीन पर दिखना चाहिए। और अगर शिकायतों के बावजूद कारोबार फिर खड़ा हो जाता है तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि आखिर कार्रवाई के बाद अवैध नेटवर्क दोबारा कैसे सक्रिय हो जाता है।
खटीमा अब जवाब मांग रहा है—कच्ची शराब के इस कथित कारोबार पर निर्णायक लगाम कब लगेगी?
